भारत पर युद्ध का असर: तेल कंपनियों को रोजाना ₹1,700 करोड़ का नुकसान

भारत की प्रमुख तेल कंपनियों IOC, BPCL और HPCL के लोगो और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों का सांकेतिक चित्रण।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल से भारत की सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियां भारी संकट में हैं। इंडियन ऑयल (IOC), बीपीसीएल (BPCL) और एचपीसीएल (HPCL) को पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की पुराने दामों पर बिक्री के कारण प्रतिदिन ₹1,600 से ₹1,700 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

पेट्रोल-डीजल की स्थिर कीमतें तेल कंपनियों पर भारी, 10 हफ्तों में ₹1 लाख करोड़ से ज्यादा की ‘अंडर-रिकवरी’

नई दिल्ली: पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिला कर रख दिया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी के बावजूद, भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम पिछले दो वर्षों से स्थिर बने हुए हैं। इसका सीधा असर देश की तीन प्रमुख सरकारी पेट्रोलियम विपणन कंपनियों—IOC, BPCL और HPCL—की वित्तीय सेहत पर पड़ रहा है।

रोजाना हो रहा ₹1,700 करोड़ तक का नुकसान

सूत्रों के अनुसार, कच्चे तेल की लागत में लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। इसके बावजूद सार्वजनिक क्षेत्र की ये कंपनियां पिछले 10 हफ्तों से पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) को पुराने दामों पर ही बेच रही हैं। लागत और बिक्री मूल्य के बीच के इस अंतर के कारण इन कंपनियों को हर दिन ₹1,600 से ₹1,700 करोड़ का भारी घाटा (अंडर-रिकवरी) हो रहा है।

10 हफ्तों में घाटा ₹1 लाख करोड़ के पार

अंडर-रिकवरी का सीधा अर्थ लागत से कम मूल्य पर उत्पादों की बिक्री करना है। पिछले ढाई महीनों (10 सप्ताह) के आंकड़ों पर नजर डालें तो इन तेल कंपनियों की कुल अंडर-रिकवरी ₹1 लाख करोड़ का आंकड़ा पार कर चुकी है। वैश्विक संकट के बीच घरेलू कीमतों को स्थिर रखना कंपनियों के लिए बड़ी वित्तीय चुनौती बनता जा रहा है।

स्थिर कीमतें और बाजार की स्थिति

वर्तमान में दिल्ली में पेट्रोल ₹94.77 प्रति लीटर और डीजल ₹87.67 प्रति लीटर की दर से बिक रहा है। हालांकि, मार्च में घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में ₹60 की बढ़ोतरी की गई थी, लेकिन यह वृद्धि भी वास्तविक लागत की भरपाई करने में नाकाफी साबित हो रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में 50% की उछाल के बाद भी घरेलू बाजार में कीमतें दो साल पुराने स्तर पर ही टिकी हुई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक संघर्ष लंबे समय तक खिंचता है, तो इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति को सुधारने के लिए सरकार को कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।

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