प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पंजाब के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा के खिलाफ जांच में बड़ा खुलासा किया है। ईडी के अनुसार, अरोड़ा की कंपनी से एक दिहाड़ी मजदूर के नाम पर चल रही फर्म को ₹27.73 करोड़ ट्रांसफर किए गए। गुरुग्राम की पीएमएलए कोर्ट में पेश दस्तावेजों के मुताबिक, मजदूर को कागजों पर करोड़ों की कंपनी का मालिक बनाया गया था।
संजीव अरोड़ा केस: ईडी की जांच में ‘शेल कंपनियों’ का बड़ा जाल
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने पंजाब के कैबिनेट मंत्री संजीव अरोड़ा से जुड़ी वित्तीय अनियमितताओं की जांच में चौंकाने वाले तथ्य पेश किए हैं। ईडी ने सोमवार को गुरुग्राम स्थित पीएमएलए (PMLA) स्पेशल कोर्ट को सूचित किया कि मंत्री की कंपनी ‘हैम्पटन स्काई रियल्टी लिमिटेड’ ने दिल्ली की एक फर्म को ₹27.73 करोड़ ट्रांसफर किए, जिसका आधिकारिक मालिक एक दिहाड़ी मजदूर पाया गया है।
दिहाड़ी मजदूर कमल अहमद के बयान ने खोला राज
ईडी की पूछताछ में दिल्ली निवासी मजदूर कमल अहमद ने स्वीकार किया है कि वह अधिक पढ़ा-लिखा नहीं है और उसे किसी भी कंपनी के संचालन की जानकारी नहीं है। Bharat Manthan Live News को मिली जानकारी के अनुसार, कमल ने अपने बयान में बताया कि अजहर हैदर उर्फ मोंटी नामक व्यक्ति ने उसका आधार कार्ड और पैन कार्ड लिया था और कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए थे।
हैदर ने भी स्वीकार किया है कि उसने यह पूरी प्रक्रिया केवल 1.5% से 2% कमीशन के लालच में की थी। इस खुलासे से अरोड़ा की कंपनी द्वारा किए गए संदिग्ध ट्रांजेक्शन पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
₹27.73 करोड़ का संदिग्ध ट्रांजेक्शन
जांच में यह सामने आया है कि संजीव अरोड़ा की फर्म ने अगस्त 2023 से जनवरी 2024 के बीच कमल अहमद की फर्म ‘एसके एंटरप्राइजेज’ के विभिन्न बैंक खातों में 41 आरटीजीएस (RTGS) पेमेंट्स के जरिए कुल ₹27.73 करोड़ भेजे।
इसके अतिरिक्त, अरोड़ा परिवार के स्वामित्व वाली फर्मों ने स्थानीय और विदेशी कंपनियों को ₹157.12 करोड़ के मोबाइल फोन बेचने का दावा किया है, जिसकी सत्यता की जांच भी ईडी कर रही है।
वर्तमान कानूनी स्थिति
संजीव अरोड़ा वर्तमान में प्रवर्तन निदेशालय की रिमांड पर हैं और उनसे लगातार पूछताछ की जा रही है। दूसरी ओर, अरोड़ा ने अपनी गिरफ्तारी को अवैध बताते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में याचिका दायर की है। ईडी का दावा है कि यह पूरा मामला मनी लॉन्ड्रिंग के एक बड़े नेटवर्क की ओर इशारा करता है, जहां गरीब लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल अवैध वित्तीय लेनदेन के लिए किया गया।
