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नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के पेपर लीक के खिलाफ छात्रों का आंदोलन जारी है। सोशल मीडिया पर चल रहे विभिन्न नैरेटिव और चेहरों पर लगते आरोपों के बीच अब पूरी परीक्षा प्रणाली, एनटीए और शिक्षा मंत्रालय की जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
जंतर-मंतर पर छात्रों का आंदोलन और उठते सवाल
नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन और जुटी भीड़ को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह के नैरेटिव चल रहे हैं। शंभुनाथ चौधरी के इस विश्लेषण के अनुसार, इस आंदोलन को लेकर कई तरह की बातें की जा रही हैं। कोई इसे बुलबुला, कोई प्रायोजित आंदोलन, तो कोई इसके पीछे आंदोलनजीवियों का हाथ बता रहा है।
चेहरों पर आरोप और असल मुद्दों की अनदेखी
सोशल मीडिया पर सीजेपी (CJP) को आम आदमी पार्टी का डमी बताया जा रहा है, वहीं सोनम वांगचुक को भी निशाना बनाया जा रहा है। इन आरोपों में सच्चाई, राजनीति या अतिशयोक्ति हो सकती है। हालांकि, मूल प्रश्न यह है कि यदि आंदोलन का चेहरा पसंद नहीं है, तो क्या उसके मंच के सामने बैठे लाखों छात्रों की चिंताएं फर्जी हो जाती हैं।
परीक्षा प्रणाली और पेपर लीक का स्थायी रोग
विश्लेषण में पहला प्रमुख सवाल यह उठाया गया है कि क्या पिछले कुछ वर्षों में देश की बड़ी प्रतियोगी परीक्षाएं बार-बार लीक नहीं हुई हैं। नीट (NEET) जैसी राष्ट्रीय परीक्षा से लेकर विभिन्न राज्यों की भर्ती परीक्षाओं तक, पेपर लीक अब एक स्थायी समस्या बन चुका है।
शीर्ष संस्थाओं की जवाबदेही पर प्रश्न
पेपर लीक की इन निरंतर घटनाओं के बाद अब यह सवाल खड़ा हो रहा है कि इसकी जवाबदेही किसकी है। क्या केवल निचले स्तर के कुछ लोगों को दोषी ठहराया जाना चाहिए या फिर उस पूरी परीक्षा व्यवस्था की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए जिसके शीर्ष पर एनटीए (NTA) और शिक्षा मंत्रालय बैठे हैं।
