हरियाणा में चिकित्सा शिक्षा निदेशालय द्वारा एमबीबीएस के मूल प्रमाण पत्र जारी करने में कथित देरी के कारण नीट-पीजी 2026 पास करने वाले 300 से अधिक डॉक्टरों का भविष्य अधर में लटक गया है। छात्रों का कहना है कि 2 नवंबर की दस्तावेज सत्यापन समय सीमा नजदीक है, जिससे उनके पीजी एडमिशन पर संकट मंडरा रहा है।
हरियाणा में एमबीबीएस सर्टिफिकेट में देरी से 300 डॉक्टरों का पीजी एडमिशन खतरे में
हरियाणा के सैकड़ों मेडिकल ग्रेजुएट्स के सामने अपनी पोस्टग्रेजुएट मेडिकल शिक्षा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, क्योंकि राज्य के अधिकारियों ने कथित तौर पर उनके मूल दस्तावेज जारी नहीं किए हैं। इससे नीट-पीजी काउंसलिंग के जरिए एमडी और एमएस कोर्स में उनके एडमिशन पर खतरा मंडरा रहा है।
डॉ. अक्षत मित्तल ने मंगलवार को ईटीवी भारत को बताया कि यदि मूल प्रमाण पत्र रोके जाने के कारण वे समय पर पीजी एडमिशन प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाते हैं, तो कम से कम 300 छात्र अपने करियर का पूरा एक साल गंवा सकते हैं।
बांड नीति और दस्तावेज सत्यापन की समय सीमा
साल 2020 बैच के 300 से अधिक एमबीबीएस ग्रेजुएट्स ने नीट-पीजी 2026 पास कर लिया है और पीजी सीटें हासिल की हैं। हालांकि, हरियाणा की एमबीबीएस बांड नीति के संबंध में उनके मूल प्रमाण पत्र अभी भी अधिकारियों के पास हैं, जिससे कई छात्र अनिवार्य दस्तावेज सत्यापन प्रक्रिया पूरी करने में असमर्थ हैं।
काउंसलिंग का पहला दौर जारी होने के कारण छात्रों ने चिंता व्यक्त की है कि अकादमिक और पात्रता आवश्यकताओं को पूरा करने के बावजूद वे एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा के माध्यम से हासिल की गई सीटें खो सकते हैं। दस्तावेज सत्यापन की अंतिम तिथि 2 नवंबर है। चूंकि 31 अक्टूबर और 1 नवंबर को वीकेंड है, इसलिए प्रभावित छात्रों के पास अपने दस्तावेज सुरक्षित करने और आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करने के लिए प्रभावी रूप से 30 अक्टूबर तक का समय है।
प्रशासन की चुप्पी और छात्रों का संघर्ष
छात्रों के अनुसार, उन्होंने अपने संबंधित मेडिकल कॉलेजों के डीन के माध्यम से औपचारिक अभ्यावेदन भेजकर हरियाणा के चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान निदेशालय (DMER) से बार-बार संपर्क किया है। हालांकि, उनका दावा है कि कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला है।
छात्रों ने कहा कि डीन ने डीएमआर के निर्देशों के बिना मूल प्रमाण पत्र जारी करने में असमर्थता व्यक्त की है। प्रशासनिक प्रयासों से कोई परिणाम न मिलने पर, छात्र अब तत्काल राहत के लिए अदालत का रुख करने पर विचार कर रहे हैं। इस विवाद ने 2020 में शुरू की गई और दिसंबर 2022 में संशोधित हरियाणा की एमबीबीएस बांड नीति के कार्यान्वयन पर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं।
