चंपाई सोरेन ने चर्च निर्माण पर उठाए सवाल, कहा आदिवासी प्रकृति पूजक हैं

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने राज्य में बढ़ते चर्च निर्माण और आदिवासी प्रकृति पूजा पर सवाल उठाए।

झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन द्वारा राज्य में चर्चों की बढ़ती संख्या पर सवाल उठाए जाने के बाद आदिवासी पहचान और धर्मांतरण को लेकर सियासी बहस तेज हो गई है। उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए आदिवासी समाज की पारंपरिक प्रकृति पूजक आस्था का हवाला देते हुए इस पर आपत्ति जताई है।

पूर्व सीएम चंपाई सोरेन के सोशल मीडिया पोस्ट से झारखंड की राजनीति में उबाल

झारखंड में आदिवासी अस्मिता और ईसाई धर्म को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन ने प्रदेश में लगातार बढ़ती चर्चों की संख्या पर सीधे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिससे पूरे राज्य के राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा शुरू हो गई है।

चंपाई सोरेन ने अपने आधिकारिक फेसबुक हैंडल पर एक पोस्ट साझा करते हुए लिखा कि जब आदिवासी समाज मूल रूप से प्रकृति पूजक है, तो राज्य में 5,000 से अधिक चर्च क्यों बनाए गए हैं? उनके इस सीधे सवाल के बाद सामाजिक और राजनीतिक संगठनों के बीच वैचारिक टकराव तेज हो गया है।

मरांग बुरु और सिंगबोंगा का दिया हवाला; विपक्ष ने लगाया ध्रुवीकरण का आरोप

भारत मंथन लाइव न्यूज के अनुसार, पूर्व मुख्यमंत्री ने आदिवासी समुदाय की पारंपरिक आस्था का जिक्र करते हुए कहा कि मूल निवासियों की आस्था सदियों से मरांग बुरु और सिंगबोंगा में रही है। इसके साथ ही उन्होंने सवालिया लहजे में पूछा कि क्या इन नवनिर्मित चर्चों में मरांग बुरु या सिंगबोंगा की पूजा की जाती है?

इस बयान के सामने आने के बाद झारखंड की राजनीति में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। जहां कुछ सामाजिक संगठन इसे आदिवासी पहचान, संस्कृति और सरना धर्म की रक्षा से जुड़ा बेहद गंभीर मुद्दा बता रहे हैं, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दलों ने चंपाई सोरेन के इस रुख पर पलटवार किया है। विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस तरह के बयानों के जरिए राज्य में धार्मिक ध्रुवीकरण की कोशिश की जा रही है। गौरतलब है कि झारखंड में धर्मांतरण, आदिवासी पहचान और सरना धर्म कोड जैसे संवेदनशील मुद्दे पहले भी राजनीतिक चर्चा के मुख्य केंद्र रहे हैं।

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