लातेहार जिले के महुआडांड़ प्रखंड के सोहर पंचायत स्थित बेलवार गांव में आजादी के 79 साल बाद भी मूलभूत सुविधाएं नहीं पहुंच सकी हैं। प्रखंड मुख्यालय से महज 14 किलोमीटर दूर स्थित 600 की आबादी वाले इस गांव के लोग सड़क, पुल और स्वच्छ पेयजल जैसी आवश्यक व्यवस्थाओं से पूरी तरह वंचित हैं।
बारिश के मौसम में दुनिया से पूरी तरह कट जाता है बेलवार गांव
झारखंड के लातेहार जिले से ग्रामीण विकास की दावों की पोल खोलती एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। भारत मंथन लाइव न्यूज के अनुसार, जिले के महुआडांड़ प्रखंड के अंतर्गत आने वाले सोहर पंचायत का बेलवार गांव आजादी के दशकों बाद भी मूलभूत सरकारी सुविधाओं से पूरी तरह महरूम है। कागजों पर देश को आजाद हुए भले ही 79 साल बीत चुके हैं, लेकिन इस गांव के लगभग 600 निवासियों के लिए धरातल पर स्थितियां आज भी जस की तस बनी हुई हैं।
प्रखंड मुख्यालय से महज 14 किलोमीटर की दूरी पर बसे बेलवार गांव तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता ग्रामीणों के लिए हर दिन मौत को न्योता देने के समान है। गांव तक पहुंचने के लिए लोगों को एक ही नदी को दो बार पैदल पार करना पड़ता है। प्रशासनिक उपेक्षा के कारण आज तक इस नदी पर एक अदद पुल का निर्माण नहीं कराया जा सका है, जिसके कारण हर साल मानसून के आगमन के साथ ही यह पूरा इलाका एक खुली जेल में तब्दील हो जाता है।
एंबुलेंस पहुंचना नामुमकिन, खाट पर नदी पार करने की मजबूरी
उफनती नदी पार कर अस्पताल पहुंचते हैं मरीज
बारिश के दिनों में नदी में उफान आने के कारण बेलवार गांव का मुख्य दुनिया से संपर्क पूरी तरह से टूट जाता है। ऐसी विकट परिस्थितियों में गांव के भीतर एंबुलेंस या किसी अन्य चारपहिया वाहन का पहुंचना पूरी तरह से नामुमकिन है। यदि कोई ग्रामीण गंभीर रूप से बीमार हो जाता है, तो उसे इलाज के लिए अस्पताल तक पहुंचाने के लिए परिजनों को मरीज को चारपाई (खाट) पर लादकर या अपने कंधों पर उठाकर तेज बहाव वाली नदी को पार कराना पड़ता है। कई बार अस्पताल पहुंचने में होने वाली अत्यधिक देरी के कारण गंभीर मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।
पीने के पानी के लिए रेत खोदने को मजबूर हैं ग्रामीण
गांव में बुनियादी ढांचे के अभाव की कहानी सिर्फ पुल और सड़क तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां स्वच्छ पेयजल का संकट भी बेहद गहरा है। गांव में न तो कोई सरकारी नल लगा है और न ही सुचारू रूप से चलने वाला कोई चापाकल मौजूद है। अपनी प्यास बुझाने के लिए स्थानीय ग्रामीण हर दिन नदी के किनारे जाकर रेत को खोदते हैं और वहां अस्थाई छोटा गड्ढा (चुंआ) बनाते हैं। इस गड्ढे में जमा होने वाले असुरक्षित और गंदे पानी को छानकर ग्रामीण पीने और खाना बनाने के उपयोग में लाते हैं। इस दूषित पानी के निरंतर सेवन से गांव के मासूम बच्चे और बुजुर्ग लगातार तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं।
