रांची में वर्ष 1855 में स्थापित रांची डिस्पेंसरी ने ब्रिटिश काल में स्वास्थ्य सेवाओं की शुरुआत की। इसका संचालन लंबे समय तक एक भारतीय डॉक्टर के नेतृत्व में हुआ। बाद के वर्षों में यह व्यवस्था धीरे-धीरे विस्तारित होकर अस्पताल प्रणाली में विकसित हुई।
रांची डिस्पेंसरी इतिहास: 1855 से स्वास्थ्य सेवाओं की शुरुआत
रांची में स्वास्थ्य सेवाओं की नींव वर्ष 1855 में रांची डिस्पेंसरी की स्थापना के साथ रखी गई थी। ऐतिहासिक तथ्यों के अनुसार, इस डिस्पेंसरी का इंचार्ज लंबे समय तक एक भारतीय डॉक्टर रहा।
स्थानीय लोगों से वसूले गए शुल्क के माध्यम से ही उस डॉक्टर का वेतन दिया जाता था।
1872 में अस्पताल की शुरुआत और विस्तार
वर्ष 1872 में रांची में स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार हुआ और एक नए अस्पताल की स्थापना की गई। इस अस्पताल में 18 मरीजों को भर्ती करने की सुविधा थी।
उसी वर्ष अस्पताल में 146 मरीज भर्ती हुए, जबकि ओपीडी में 1789 मरीजों का इलाज किया गया।
समय के साथ बढ़ा अस्पताल का स्वरूप
अगले बारह वर्षों में इस अस्पताल का विस्तार हुआ और यह एक कच्चे भवन के रूप में विकसित हुआ। इसका आकार धीरे-धीरे बढ़ता गया।
वर्ष 1913 में यहां संक्रामक रोगों के लिए दो वार्ड बनाए गए। इसके बाद 1914 में 20000 रुपये की लागत से नई ओपीडी बिल्डिंग का निर्माण किया गया।
1915 में हजारों मरीजों का इलाज
यह अस्पताल सिविल सर्जन के अधीन कार्य करता था। वर्ष 1915 में यहां कुल 17466 मरीजों का इलाज किया गया।
आसपास के क्षेत्रों में भी खुलीं डिस्पेंसरी
रांची के बाद वर्ष 1881 में लोहरदगा में डिस्पेंसरी स्थापित की गई, जिसे बाद में 15000 रुपये खर्च कर विस्तारित किया गया।
इसके बाद बुंडू और चैनपुर में वर्ष 1902 में, गुमला में 1903 में, सिल्ली में 1906 में और खूंटी में 1907 में डिस्पेंसरी खोली गई।
मिशनरी संस्थाओं की भूमिका
उस समय इंग्लैंड में किंग एडवर्ड का शासन था। मुरहू में संचालित एक निजी डिस्पेंसरी को सबसे सफल माना जाता था, जिसे एसपीजी मिशन द्वारा संचालित किया जाता था और जिला परिषद से अनुदान मिलता था।
इस डिस्पेंसरी की स्थापना वर्ष 1905 में रेव्ह डॉ केनेडी ने की थी।
रांची में एलिजाबेथ डिस्पेंसरी का संचालन लुथेरन मिशन द्वारा किया जाता था।
1867 में शुरू हुआ वैक्सीनेशन
रांची में वैक्सीनेशन की शुरुआत वर्ष 1867 में की गई थी, जो उस समय स्वास्थ्य सेवाओं के विकास में एक महत्वपूर्ण कदम था।
