झारखंड हाईकोर्ट ने गुमला, सिमडेगा, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम जिलों में आदिवासी जमीन के कथित अवैध हस्तांतरण को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सख्त रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सोनक और न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने केंद्र, राज्य सरकार और चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया है।
आदिवासी जमीन के हस्तांतरण पर झारखंड हाईकोर्ट का कड़ा रुख
झारखंड में आदिवासी भूमि के कथित अवैध हस्तांतरण को लेकर दायर की गई एक जनहित याचिका पर झारखंड हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर रुख अख्तियार किया है। अदालत ने इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए देश और राज्य की कई बड़ी संवैधानिक संस्थाओं को कानूनी नोटिस भेजकर उनसे जवाब तलब किया है।
भारत मंथन लाइव न्यूज को मिली जानकारी के अनुसार, हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एस. एम. सोनक और न्यायाधीश राजेश शंकर की खंडपीठ ने इस जनहित याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अदालत ने मामले को बेहद महत्वपूर्ण और गंभीर बताते हुए केंद्र सरकार, झारखंड राज्य सरकार और भारतीय चुनाव आयोग को नोटिस जारी कर अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया है।
सीएनटी एक्ट के उल्लंघन और जनसांख्यिकी बदलने का आरोप
यह जनहित याचिका याचिकाकर्ता विष्णु साहू की ओर से अदालत में दाखिल की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य के गुमला, सिमडेगा, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम जिलों के अंतर्गत आने वाली हजारों एकड़ आदिवासी भूमि को अवैध तरीके से जीईएल (GEL) मिशन और आरसी (RC) मिशन से जुड़ी विभिन्न संस्थाओं के नाम पर हस्तांतरित कर दिया गया है।
याचिकाकर्ता का स्पष्ट दावा है कि भूमि हस्तांतरण की यह पूरी प्रक्रिया छोटानागपुर काश्तकारी (CNT) अधिनियम की मूल भावना और उसके वैधानिक प्रावधानों के पूरी तरह विपरीत है। इसके अतिरिक्त, याचिका में यह गंभीर चिंता भी जताई गई है कि इस बड़े पैमाने पर हुए भूमि हस्तांतरण के कारण संबंधित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्रों की जनसांख्यिकीय स्थिति (डेमोग्राफी) पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।
उपायुक्तों और अनुसूचित जनजाति आयोग से भी जवाब तलब
मामले में लगे आरोपों की व्यापकता और गंभीरता को ध्यान में रखते हुए झारखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ ने जांच का दायरा विस्तृत कर दिया है। अदालत ने मामले से जुड़े चारों जिलों (गुमला, सिमडेगा, खूंटी और पश्चिम सिंहभूम) के उपायुक्तों (DC) तथा केंद्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को भी इस जनहित याचिका में आधिकारिक रूप से पक्षकार बनाया है और उनसे भी रिपोर्ट मांगी है।
खंडपीठ ने अपनी प्रारंभिक टिप्पणी में कहा कि यह मामला सीधे तौर पर जनजातीय अधिकारों और भूमि कानूनों के अनुपालन से जुड़ा है, इसलिए इसकी विस्तृत जांच और सभी पक्षों का जवाब आवश्यक है। अदालत इस मामले की अगली सुनवाई के दौरान विभिन्न पक्षों द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले जवाबों, हलफनामों और रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य तथ्यों पर विस्तार से विचार-विमर्श करेगी।
