नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव होता है तो भारत इस समझौते को पुनर्संतुलित (रीबैलेंस) करने से पीछे नहीं हटेगा।
दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारत अपने राष्ट्रीय और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है। अमेरिकी प्रशासन की ओर से शुल्क (टैरिफ) में संभावित बदलाव के संकेतों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थिति लगातार विकसित हो रही है और किसी भी परिवर्तन की स्थिति में समझौते की शर्तों की पुनर्समीक्षा की जाएगी।
टैरिफ अनिश्चितता के बीच वार्ता
फरवरी 2026 की शुरुआत में भारत और अमेरिका के बीच एक अंतरिम व्यापार ढांचे पर सहमति बनी थी। इसके तहत अमेरिका ने भारतीय उत्पादों पर लागू कुल 50 प्रतिशत शुल्क को घटाकर 18 प्रतिशत करने का संकेत दिया था।
हालांकि, अमेरिकी न्यायिक हस्तक्षेप और नई वैश्विक शुल्क नीति के बाद स्थिति में अनिश्चितता पैदा हो गई है। इसी कारण मुख्य वार्ताकारों के स्तर पर होने वाली कुछ महत्वपूर्ण बैठकों को फिलहाल टाल दिया गया है।
मंत्री ने संकेत दिया कि भारत अमेरिकी टैरिफ नीति पर स्पष्टता का इंतजार कर रहा है और इस संबंध में कानूनी राय भी ली जा रही है, ताकि संभावित प्रभावों को समझा जा सके।
किसानों और डेयरी सेक्टर को राहत
पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि भारत ने संवेदनशील क्षेत्रों में कोई समझौता नहीं किया है।
- डेयरी, मक्का, सोयाबीन और पोल्ट्री क्षेत्र को व्यापार समझौते से पूरी तरह बाहर रखा गया है।
- भारत में किसी भी प्रकार के जेनेटिकली मॉडिफाइड (GM) खाद्य पदार्थों के आयात की अनुमति नहीं दी जाएगी।
- सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि भारतीय कृषि बाजार पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।
उन्होंने कहा कि किसानों और स्थानीय उद्योगों की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।
निर्यात को लेकर सरकार आश्वस्त
वैश्विक व्यापारिक चुनौतियों के बावजूद मंत्री ने भरोसा जताया कि भारत का निर्यात इस वर्ष बढ़ेगा। उन्होंने कहा कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार प्रतिस्पर्धात्मक लाभ पर आधारित होता है और भारत अपने निर्यातकों के लिए बेहतर अवसर सुनिश्चित करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
अंत में पीयूष गोयल ने कहा कि भारत फिलहाल “रुको और देखो” की नीति अपना रहा है, लेकिन अंतिम समझौता तभी होगा जब वह देश के सर्वोत्तम हित में होगा।
