गुमला के सकरौली में जमीन को लेकर विवाद
गुमला जिले के सिसई प्रखंड क्षेत्र के सकरौली कुंबा टोली गांव में करीब 8 एकड़ 77 डिसमिल जमीन को लेकर ग्रामीणों और वन विभाग के बीच विवाद का मामला सामने आया है। ग्रामीणों का आरोप है कि जिस जमीन पर उनके परिवार का लंबे समय से दखल-कब्जा है, वहां वन विभाग ने फेंसिंग के लिए लगाए गए खंभे तोड़ दिए।
ग्रामीणों के मुताबिक, जमीन को लेकर लंबे समय से मालगुजारी भी दी जा रही है। खंभे तोड़े जाने की कार्रवाई के बाद ग्रामीणों में नाराजगी है।
जमीन पर खेती और फेंसिंग के खंभे मिले
मामले की जानकारी लेने के लिए स्थल पर पहुंचने पर फेंसिंग के लिए लगाए गए कई खंभे टूटे हुए मिले। जमीन के बड़े हिस्से में खेती की जा रही थी, जबकि कुछ स्थानों पर पौधरोपण के लिए गड्ढे भी खोदे गए थे।
जमीन पर दावेदारी करने वाले इरकन लकड़ा ने वन भूमि पर कब्जे के आरोप को खारिज किया। उनका दावा है कि यह जमीन उनके पूर्वजों को वर्ष 1950 में रातू महाराज की ओर से दी गई थी।
इरकन लकड़ा ने इसके समर्थन में हुकुमनामा होने की बात कही। उन्होंने पुरानी जमींदारी रसीद, अंचल की ऑफलाइन रसीद, ऑनलाइन मालगुजारी रसीद, अंचल कार्यालय के सीमांकन से जुड़े दस्तावेज और जमीन का नक्शा होने की जानकारी दी।
1950 से दखल-कब्जे और मालगुजारी का दावा
इरकन लकड़ा के अनुसार, वर्ष 1950 से उनके पूर्वज और परिवार के लोग इस जमीन पर दखल-कब्जे में हैं। उनके मुताबिक, पहले जमींदार को मालगुजारी दी जाती थी और बाद में अंचल कार्यालय में भी मालगुजारी जमा की जाती रही है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि जमीन से लगी उनकी खतियानी जमीन मौजूद है और वर्तमान समय तक ऑनलाइन रसीद कट रही है।
औषधीय पौधे लगाने की तैयारी का दावा
इरकन लकड़ा के मुताबिक, हाल के दिनों में उन्होंने जमीन पर औषधीय पौधे लगाने की तैयारी शुरू की थी। इसके लिए कई जगह गड्ढे खोदे गए और जंगली जानवरों से पौधों की सुरक्षा के लिए फेंसिंग करने के उद्देश्य से खंभे लगाए गए थे।
उनका आरोप है कि वन विभाग के कर्मियों ने बिना सूचना दिए इन खंभों को तोड़ दिया। उन्होंने इससे आर्थिक नुकसान होने की बात कही है।
इरकन लकड़ा ने बताया कि सकरौली मंगू टोली स्थित उनके आवास में आयुर्वेदिक अनुसंधान केंद्र भी संचालित है। उनके अनुसार, यहां आयुर्वेदिक पद्धति से लोगों का इलाज किया जाता है और उपचार में विभिन्न जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल होता है।
जड़ी-बूटियों की जरूरत को देखते हुए उन्होंने अपनी जमीन पर औषधीय पौधे लगाने की योजना बनाई थी।
ग्रामीण ने भी लंबे समय से खेती का दावा किया
सकरौली पत्रा टोली निवासी गोईंदा उरांव ने बताया कि इरकन लकड़ा और उनके पूर्वज लंबे समय से इस जमीन पर खेती करते आ रहे हैं। वर्तमान में उन्हें खेती के लिए जमीन दी गई है और वह उसी जमीन पर खेती कर रहे हैं।
गोईंदा उरांव के अनुसार, इससे पहले वन विभाग की ओर से इस जमीन पर न तो वृक्षारोपण किया गया और न ही कोई अन्य वन विभागीय गतिविधि हुई।
जमीन की स्थिति सरकारी अभिलेखों से होगी स्पष्ट
जमीन के वास्तविक स्वामित्व और उसके राजस्व अथवा वन भूमि की स्थिति का अंतिम निर्धारण संबंधित सरकारी अभिलेखों और सक्षम प्राधिकारी की जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि जमीन वन भूमि है तो इतने लंबे समय से परिवार का दखल-कब्जा और मालगुजारी भुगतान किस आधार पर होता रहा, इसकी जांच होनी चाहिए। साथ ही वे सवाल उठा रहे हैं कि यदि वन विभाग जमीन पर अपना दावा करता है तो फेंसिंग के खंभे तोड़ने से पहले संबंधित पक्ष को सूचना क्यों नहीं दी गई।
फिलहाल खंभे तोड़े जाने के बाद ग्रामीणों में नाराजगी है। ग्रामीण पूरे मामले की निष्पक्ष जांच और दस्तावेजों के आधार पर जमीन की स्थिति स्पष्ट करने की मांग कर रहे हैं।
