लालू यादव कांस्टेबल बनने का देखते थे सपना, ऐसे बने राष्ट्रीय जननेता

बिहार के वरिष्ठ राजनेता लालू प्रसाद यादव के छात्र जीवन से लेकर संसद तक के राजनीतिक सफर की एक झलक।

बिहार की राजधानी पटना से लेकर देश की संसद तक अपनी राजनीतिक गूंज रखने वाले लालू प्रसाद यादव की कहानी बेहद दिलचस्प है। गोपालगंज के फुलवरिया गांव में जन्मे लालू यादव शुरुआत में केवल एक कांस्टेबल बनना चाहते थे, लेकिन पटना विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति और वर्ष 1974 के जेपी आंदोलन ने उनकी जिंदगी की दिशा बदलकर उन्हें राष्ट्रीय राजनीति का चेहरा बना दिया।

फुलवरिया गांव से शुरू हुआ सफर, कांस्टेबल बनने का था सपना

पटना: भारत की राजनीति में लालू प्रसाद यादव का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है, जिनकी जीवन यात्रा किसी फिल्मी पटकथा जैसी प्रतीत होती है। 11 जून 1948 को बिहार के गोपालगंज जिले के फुलवरिया गांव में एक साधारण किसान परिवार में जन्मे लालू यादव का बचपन भारी आर्थिक संघर्षों के बीच बीता था। एक बड़े परिवार और सीमित संसाधनों के कारण उनके शुरुआती सपने भी बेहद सामान्य थे। वे सिर्फ एक सुरक्षित सरकारी नौकरी पाना चाहते थे ताकि परिवार की माली हालत सुधर सके। युवावस्था में उनका झुकाव विशेष रूप से पुलिस विभाग की ओर था और वे कांस्टेबल बनने की इच्छा रखते थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।

छात्र राजनीति ने बदली दिशा, पटना यूनिवर्सिटी से मिली पहचान

लालू प्रसाद यादव की जिंदगी का टर्निंग पॉइंट तब आया जब उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए पटना विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। यहाँ पढ़ाई के दौरान उनकी रुचि छात्र राजनीति की ओर बढ़ने लगी। वर्ष 1970 में उन्होंने पटना यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (PUSU) के महासचिव का चुनाव जीता, जो उनके सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन की पहली बड़ी सफलता थी। इसके बाद, वर्ष 1973 में वे छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए। इसी दौर में देश और बिहार की राजनीति बड़े बदलावों से गुजर रही थी और लालू यादव की नेतृत्व क्षमता धीरे-धीरे सामने आने लगी थी।

जेपी आंदोलन और आपातकाल ने दी जननेता के रूप में पहचान

साल 1974 में जब जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने तत्कालीन सरकार और भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन की शुरुआत की, तो लालू यादव इस आंदोलन में सक्रिय रूप से कूद पड़े। आपातकाल (इमरजेंसी) के काले दौर के दौरान उन्हें जेल की सलाखों के पीछे भी रहना पड़ा। Bharat Manthan Live News के अनुसार, यही संघर्ष उनके भावी राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी पूंजी साबित हुआ। जेल से रिहा होने के बाद उनकी छवि केवल एक छात्र नेता की नहीं, बल्कि एक उभरते हुए कद्दावर जननेता की बन चुकी थी। उनके समर्थक आज भी उन्हें सामाजिक न्याय का प्रतीक मानते हैं, जबकि आलोचक उन्हें विवादों से घिरा नेता बताते हैं।

महज 29 साल की उम्र में पहली बार संसद पहुंचे लालू यादव

वर्ष 1977 में जब देश से आपातकाल समाप्त हुआ और लोकसभा चुनाव घोषित हुए, तो जनता पार्टी ने युवा लालू यादव को अपना उम्मीदवार बनाया। उस चुनाव में देश भर में चली जनता पार्टी की लहर के सहारे लालू यादव भारी मतों से जीतकर देश की संसद पहुंच गए। लोकसभा सदस्य बनते समय उनकी उम्र महज 29 वर्ष थी, जिसके कारण वे उस दौर के सबसे युवा सांसदों की फेहरिस्त में शामिल हुए। संसद तक का यह सफर उनके लिए तो सिर्फ एक शुरुआत थी, जिसने आगे चलकर उन्हें देश की गठबंधन सरकारों का एक अपरिहार्य चेहरा बना दिया।

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