बिलासपुर हाई कोर्ट: 4.39 करोड़ विवाद में FIR रद्द करने से इनकार

बिलासपुर हाई कोर्ट ने 4.39 करोड़ के क्रशर विवाद में FIR रद्द करने की याचिका खारिज की

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुर्ग जिले के उतई क्षेत्र में 4.39 करोड़ रुपये के जमीन, क्रशर प्लांट और मशीनरी लेन-देन मामले में दर्ज प्राथमिकी (FIR) रद्द करने से इनकार कर दिया है। भिलाई की कांग्रेस पार्षद, उनके पति और बेटे की याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध बनता है और पुलिस को निष्पक्ष जांच का अधिकार है।

बिलासपुर हाई कोर्ट ने 4.39 करोड़ विवाद में FIR रद्द करने से किया इनकार

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने दुर्ग जिले के उतई थाना क्षेत्र में जमीन, क्रशर प्लांट और मशीनरी से जुड़े करीब 4.39 करोड़ रुपये के लेन-देन के मामले में दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शिकायत में प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के आरोप सामने आते हैं, इसलिए जांच को शुरुआती स्तर पर रोका नहीं जा सकता। हाई कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए पुलिस को मामले की निष्पक्ष और व्यापक जांच जारी रखने का निर्देश दिया है।

कांग्रेस पार्षद समेत तीन लोगों ने दायर की थी याचिका

भिलाई की कांग्रेस महिला पार्षद रीता सिंह, उनके पति रमेशचंद्र सिंह और बेटे मानव चंद्र सिंह ने एफआईआर को चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ताओं के खिलाफ उतई थाने में 2 अगस्त को बीबी सिंह की शिकायत पर अदालत के आदेश के बाद मामला दर्ज किया गया था।

याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि पूरा विवाद मूल रूप से सिविल और व्यावसायिक प्रकृति का है, इसलिए इसे आपराधिक मामले का रूप देकर एफआईआर दर्ज करना उचित नहीं है।

2008 की जमीन खरीद और लेन-देन का विवाद

याचिकाकर्ताओं के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2008 में जमीन के 15 टुकड़े खरीदे थे। इनमें से सात जमीनों की रजिस्ट्री कराई गई थी, जबकि आठ जमीनों पर समझौते के आधार पर कब्जा लिया गया था। बाद में 29 फरवरी 2024 को जमीन, मशीनरी और क्रशर प्लांट को लेकर दूसरे पक्ष के साथ समझौता हुआ और कब्जा सौंपा गया। इसके बाद बिजली बिल, खनन से जुड़ी देनदारियों और भुगतान को लेकर विवाद बढ़ गया।

तीसरे पक्ष और सरकारी लीज की जमीन का आरोप

शिकायतकर्ता बीबी सिंह का आरोप है कि समझौते में शामिल कुछ जमीनें तीसरे पक्ष की थीं, कुछ सरकारी लीज पर थीं और कुछ पर हस्तांतरण का अधिकार नहीं था। शिकायत में 4.39 करोड़ रुपये के भुगतान और दस्तावेजों में हस्ताक्षरों के गलत इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं।

हाई कोर्ट का रुख

हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि सिविल मुकदमा लंबित होना आपराधिक जांच रोकने का आधार नहीं बनता। यदि संज्ञेय अपराध के संकेत हैं, तो पुलिस को जांच का पूरा अधिकार है।

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