पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। विश्लेषकों के अनुसार, इस उछाल के चलते भारतीय सार्वजनिक क्षेत्र की तेल विपणन कंपनियों को पेट्रोल पर 5 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 23 रुपये प्रति लीटर का नुकसान (मार्केटिंग मार्जिन घाटा) उठाना पड़ रहा है।
पश्चिम एशिया में तनाव से अंतरराष्ट्रीय बाजार में उछाल
पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम जुलाई के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। ब्रेंट क्रूड 2.5 प्रतिशत की बढ़त के साथ 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है, जबकि अमेरिकी वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) क्रूड लगभग 2 प्रतिशत बढ़कर 95 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में आए इस तेज उछाल के बावजूद भारत में ईंधन की खुदरा दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया है, जिससे तेल कंपनियों के विपणन मार्जिन पर भारी दबाव पड़ रहा है।
पेट्रोल, डीजल और एलपीजी पर तेल कंपनियों को भारी घाटा
रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और कॉरपोरेट रेटिंग्स के सह-समूह प्रमुख प्रशांत वशिष्ठ के अनुसार, भारतीय क्रूड बास्केट की कीमत लगभग 109 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है।
सितंबर महीने के औसत मूल्यों के आधार पर, तेल कंपनियों को पेट्रोल की बिक्री पर प्रति लीटर 5 रुपये और डीजल पर 23 रुपये प्रति लीटर का मार्केटिंग मार्जिन घाटा हो रहा है। इसके अतिरिक्त, घरेलू एलपीजी सिलेंडर पर कंपनियों को प्रति सिलेंडर लगभग 200 रुपये की अंडर-रिकवरी (लागत से कम पर बिक्री) का सामना करना पड़ रहा है।
भारत पर अंतरराष्ट्रीय कीमतों के प्रभाव का विश्लेषण
भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक और उपभोक्ता देश है, जो अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का 88 प्रतिशत से अधिक हिस्सा विदेशों से आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय कीमतों में लंबे समय तक रहने वाली यह तेजी देश के डॉलर-मूल्य वाले आयात बिल को बढ़ा सकती है, जिससे व्यापार संतुलन और भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
भारत मंथन लाइव न्यूज की विशेष रिपोर्ट
भारत मंथन लाइव न्यूज के अनुसार, यदि भू-राजनीतिक परिस्थितियां इसी तरह बनी रहती हैं, तो कच्चे तेल की दरों में और अधिक बढ़ोतरी हो सकती है। चीन सहित कई देश अपनी खपत के लिए रणनीतिक भंडार का उपयोग कर रहे थे, और बाजार में उनकी वापसी सीमित आपूर्ति के बीच मांग को और बढ़ा सकती है। घरेलू स्तर पर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें ईंधन और परिवहन लागत के माध्यम से मुद्रास्फीति को भी प्रभावित कर सकती हैं।
