भारत ने रविवार को उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे से होकर गुजरने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति को खारिज कर दिया। नई दिल्ली ने कहा कि काठमांडू द्वारा क्षेत्रीय दावों का एकतरफा विस्तार करना पूरी तरह से अस्थिर और निराधार है, क्योंकि इस मार्ग का उपयोग दशकों से किया जा रहा है।
भारत ने नेपाल के दावों को किया खारिज
नई दिल्ली ने रविवार को उत्तराखंड के दशकों पुराने लिपुलेख दर्रे के माध्यम से होने वाली आगामी कैलाश मानसरोवर यात्रा पर नेपाल की आपत्ति को खारिज कर दिया। भारत ने स्पष्ट किया कि इस तरह का “एकतरफा कृत्रिम विस्तार” (unilateral artificial enlargement) पूरी तरह से अस्थिर और निराधार है।
विदेश मंत्रालय (MEA) की यह कड़ी प्रतिक्रिया नेपाल के विदेश मंत्रालय के उस बयान के कुछ घंटों बाद आई, जिसमें काठमांडू ने दावा किया था कि यह क्षेत्र उसका है और इस यात्रा के मार्ग को अंतिम रूप देने से पहले उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।
पिछले सप्ताह विदेश मंत्रालय ने घोषणा की थी कि वार्षिक कैलाश मानसरोवर यात्रा जून से अगस्त तक दो मार्गों—उत्तराखंड के लिपुलेख दर्रे और सिक्किम के नाथू ला दर्रे—से आयोजित की जाएगी।
धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व
चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में स्थित माउंट कैलाश और मानसरोवर झील की इस तीर्थयात्रा का हिंदुओं, जैनियों और बौद्धों के लिए गहरा धार्मिक महत्व है। दोनों देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाने के प्रयासों के तहत भारत और चीन द्वारा लगभग पांच वर्षों के अंतराल के बाद पिछले साल इस यात्रा को फिर से शुरू किया गया था।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस संबंध में भारत का रुख सुसंगत और स्पष्ट रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा का एक दीर्घकालिक मार्ग रहा है और इस मार्ग से दशकों से यात्रा हो रही है।”
प्रवक्ता ने आगे कहा, “यह कोई नई बात नहीं है। जहां तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत का यह निरंतर रुख रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। ऐसे क्षेत्रीय दावों का एकतरफा कृत्रिम विस्तार पूरी तरह से अस्थिर है।”
बातचीत और कूटनीति के लिए दरवाजे खुले
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यह भी कहा कि भारत द्विपक्षीय संबंधों के सभी मुद्दों पर नेपाल के साथ “रचनात्मक बातचीत” के लिए खुला है, जिसमें “बातचीत और कूटनीति” के माध्यम से बकाया सीमा मुद्दों को सुलझाना भी शामिल है।
इससे पहले, नेपाल के विदेश मंत्रालय ने एक बयान में दावा किया था कि लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं, जो 1816 की सुगौली संधि पर आधारित हैं।
