बिलासपुर में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने सूरजपुर जिले के एक दशक पुराने रिश्वत मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय के लेखाकार मुरली प्रसाद चौधरी को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि अवैध मांग साबित किए बिना केवल नोटों की बरामदगी के आधार पर भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत दोषसिद्धि नहीं हो सकती।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने खारिज की निचली अदालत की सजा
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने वर्ष 2014 के रिश्वत मामले में आरोपी जिला शिक्षा अधिकारी (डीईओ) कार्यालय सूरजपुर के लेखाकार मुरली प्रसाद चौधरी को सभी आरोपों से बरी कर दिया है।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी की एकल पीठ ने 18 सितंबर को पारित अपने आदेश में सूरजपुर के विशेष न्यायाधीश द्वारा 30 मार्च 2017 को सुनाई गई जेल की सजा के फैसले को रद्द कर दिया।
केवल नोट बरामदगी से दोषसिद्धि संभव नहीं: उच्च न्यायालय
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत अपराध साबित करने के लिए रिश्वत की अवैध मांग का सबूत सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
जस्टिस नरेश कुमार चंद्रवंशी ने आदेश में कहा कि जब तक अभियोजन पक्ष बिना किसी उचित संदेह के अवैध मांग को साबित नहीं करता, तब तक केवल आरोपी से रंगे हाथ नोटों की बरामदगी से दोषसिद्धि नहीं हो सकती।
वर्ष 2014 में भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो ने बिछाया था जाल
मामले के अनुसार शिकायतकर्ता मोहित राम राजवाड़े ने भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो के पुलिस अधीक्षक से शिकायत की थी। उसने आरोप लगाया था कि स्कूल की मान्यता से जुड़े काम के एवज में रिश्वत मांगी गई थी।
अभियोजन पक्ष का दावा था कि प्रारंभिक 15,000 रुपये की मांग को बाद में घटाकर 8,000 रुपये कर दिया गया था। इसके बाद 30 जून 2014 को ट्रैप की कार्रवाई कर लेखाकार की जेब से फिनोलफ्थलीन पाउडर लगे 8,000 रुपये बरामद किए गए थे।
जमानती बांड और जुर्माना राशि पर न्यायालय का निर्देश
जांच पूरी होने के बाद आरोपी के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 7, 13(1)(d) और 13(2) के तहत आरोप पत्र दायर किया गया था।
उच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि जमानत पर बाहर चल रहे याचिकाकर्ता का जमानती बांड भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 481 के तहत अगले छह महीने तक प्रभावी रहेगा। इसके अलावा जमा की गई जुर्माना राशि कानून के अनुसार अपीलकर्ता को वापस की जाएगी।
