निर्माण श्रमिकों की व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य मानकों को तय करने की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट सोमवार को सुनवाई के लिए सहमत हो गया। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ ने केंद्र सरकार, हरियाणा सरकार और अन्य से इस जनहित याचिका (PIL) पर जवाब मांगा है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्माण श्रमिकों की सुरक्षा याचिका पर भेजा नोटिस
उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2020 के कोड के तहत भवन और अन्य निर्माण कार्यों में लगे श्रमिकों के लिए व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य मानकों को निर्धारित करने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार और अन्य पक्षों से जवाब मांगा है। यह मामला मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी मोहना की पीठ के समक्ष आया।
2020 के कानून में सुरक्षा तंत्र की कमी का मुद्दा
याचिकाकर्ता ‘नेशनल कैंपेन कमेटी फॉर सेंट्रल लेजिस्लेशन ऑन कंस्ट्रक्शन लेबर’ (NCCCLCL) की ओर से पेश अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने पीठ को बताया कि यह याचिका निर्माण श्रमिकों की व्यावसायिक सुरक्षा का मुद्दा उठाती है। भूषण ने तर्क दिया कि ‘ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020’ इस मुद्दे को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं करता है।
हादसों के बाद मुआवजे के लिए तंत्र का अभाव
अदालत को अवगत कराया गया कि निर्माण स्थल पर कोई हादसा होने के बाद सामान्यतः केवल एक FIR दर्ज की जाती है। श्रमिकों को दिए जाने वाले मुआवजे का निर्धारण करने के लिए कोई निश्चित तंत्र मौजूद नहीं है। प्रशांत भूषण ने कहा कि याचिका में ऐसे सुझाव शामिल हैं जिन्हें अदालत के निर्देशों में शामिल किया जा सकता है।
गुरुग्राम निर्माण स्थल हादसे की स्वतंत्र जांच की मांग
इस याचिका में 9 मार्च 2026 को गुरुग्राम के सिधरावली इलाके में एक निर्माण स्थल पर हुए हादसे की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच के साथ-साथ मृतक और घायल श्रमिकों के लिए मुआवजा और पुनर्वास लाभ प्रदान करने की मांग की गई है।
राष्ट्रीय स्तर पर डेटा और तंत्र बनाने का प्रस्ताव
याचिका में केंद्र सरकार, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्माण स्थल पर होने वाली मौतों, गंभीर चोटों, दुर्घटनाओं के कारणों, निरीक्षणों, वैधानिक कार्रवाइयों, मुआवजे और कल्याणकारी लाभों का रिकॉर्ड रखने और प्रकाशित करने के लिए एक समान राष्ट्रीय तंत्र स्थापित करने का निर्देश देने की भी मांग की गई है। पीठ ने सुझाव दिया कि नगर एवं ग्राम नियोजन विभाग को भी इसमें पक्षकार बनाया जा सकता है।
