गया: बिहार के गया जिले के तारवापहाड़ी गांव में नक्सल प्रभावित क्षेत्र में स्कूल स्थापित करने का सपना आखिरकार साकार होता दिख रहा है, जहां धर्मेंद्र कुमार के वर्षों के संघर्ष और समर्पण के बाद दो मंजिला स्कूल भवन लगभग तैयार हो चुका है।
गया के नक्सल प्रभावित गांव में शिक्षा की नई शुरुआत
गया: बिहार के गया जिले के बंकेबाजार प्रखंड के भलुआहर गांव के रहने वाले धर्मेंद्र कुमार का वर्षों पुराना सपना अब पूरा होता नजर आ रहा है। नक्सल प्रभावित तारवापहाड़ी गांव में सरकारी स्कूल स्थापित करने की उनकी मुहिम अब सफल दिशा में पहुंच चुकी है।
यह क्षेत्र लंबे समय तक नक्सल प्रभाव में रहा, जिससे यहां शिक्षा व्यवस्था स्थापित करना मुश्किल था।
IAS सपना छोड़कर शुरू किया शिक्षा अभियान
गांव के बच्चों के लिए समर्पित किया जीवन
धर्मेंद्र कुमार ने अपने IAS बनने के सपने को छोड़कर गांव में स्कूल स्थापित करने का संकल्प लिया। उन्होंने तय किया कि जब तक स्कूल नहीं बन जाता, तब तक वे न तो बाल कटवाएंगे और न ही दाढ़ी बनाएंगे।
उन्होंने कहा कि सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से मदद न मिलने के बावजूद उन्होंने अपना प्रयास जारी रखा।
101 दिन की साइकिल यात्रा
पूरे भारत में समर्थन की तलाश
धर्मेंद्र कुमार ने अपने मिशन के लिए 101 दिनों की साइकिल यात्रा की और देशभर में समर्थन जुटाने का प्रयास किया। हालांकि उन्हें राष्ट्रपति से मुलाकात का अवसर नहीं मिला।
इसके बाद वे गांव लौटे और बच्चों को पढ़ाना शुरू किया।
गांव में शिक्षा की बड़ी चुनौती
स्कूल से 3–4 किलोमीटर दूरी
तारवापहाड़ी गांव में लगभग 700 की आबादी और करीब 100 घर हैं। यहां प्राथमिक और मध्य विद्यालय 3 से 4 किलोमीटर दूर स्थित हैं, जिससे बच्चों के लिए रोजाना स्कूल जाना बेहद कठिन था।
इस कारण गांव में लंबे समय तक शिक्षा की स्थिति कमजोर बनी रही।
चैरिटी संगठन की मदद से मिला सहारा
दो मंजिला भवन लगभग तैयार
धर्मेंद्र कुमार के प्रयासों के बाद गुजरात आधारित एक चैरिटेबल ट्रस्ट की मदद से दो मंजिला स्कूल भवन का निर्माण लगभग पूरा हो चुका है।
हालांकि स्कूल को पूरी तरह शुरू होने में अभी कुछ समय लगेगा।
गांव में खुशी का माहौल
ग्रामीणों ने जताई राहत
धर्मेंद्र कुमार की मां चंपा देवी ने कहा कि अब गांव में खुशी का माहौल है और स्कूल बनने से बच्चों का भविष्य बेहतर होगा।
स्थानीय ग्रामीण रामाशिष भारती ने बताया कि गांव में शिक्षा की स्थिति बेहद कमजोर रही है और अधिकतर युवा रोजगार और शिक्षा के लिए बाहर जाने को मजबूर थे।
