केंद्र सरकार 1 अगस्त से लागू करेगी सख्त उत्सर्जन मानक

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय 1 अगस्त से सख्त उत्सर्जन मानक लागू करने जा रहा है।

उत्तर क्षेत्र में वायु प्रदूषण को कम करने के लिए, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय 1 अगस्त से सख्त उत्सर्जन मानक लागू करने जा रहा है। यह निर्णय केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव की अध्यक्षता में हुई बैठक में लिया गया, जिसमें प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों और वास्तविक समय की निगरानी प्रणाली की प्रगति की समीक्षा की गई।

प्रदूषण को कम करने के लिए नए उत्सर्जन मानक

औद्योगिक गतिविधियों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय 1 अगस्त से सख्त उत्सर्जन मानक (emission norms) लागू करने जा रहा है। यह निर्णय हाल ही में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव और राज्य मंत्री कीर्ति वर्धन सिंह द्वारा राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों के लिए वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) और केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अधिकारियों के साथ हुई बैठक में लिया गया।

यह बैठक दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के उद्योगों द्वारा ऑनलाइन निरंतर उत्सर्जन निगरानी प्रणाली (OCEMS) और वायु प्रदूषण नियंत्रण उपकरणों (APCDs) को स्थापित करने की प्रगति की समीक्षा करने के लिए आयोजित की गई थी, ताकि कड़े उत्सर्जन मानकों का अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके।


निगरानी प्रणालियों का महत्व

सूत्रों के अनुसार, बैठक के दौरान इस विषय पर विस्तृत विचार-विमर्श किया गया। अधिकारियों ने मंत्रियों को OCEMS और APCDs की स्थापना की स्थिति से अवगत कराया।

OCEMS उत्सर्जन और बहिःस्राव (effluents) की निरंतर और वास्तविक समय की निगरानी को सक्षम करके प्रदूषण प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह पारदर्शिता को बढ़ावा देता है और डेटा में हेरफेर की संभावना को कम करता है। उद्योगों द्वारा वायु उत्सर्जन और जल प्रवाह की निरंतर निगरानी के लिए अपनाए गए ये सिस्टम पर्यावरण नियमों का पालन सुनिश्चित करते हैं।

ये सिस्टम संबंधित एजेंसियों को वास्तविक समय का डेटा भेजते हैं, और यदि प्रदूषण का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक हो जाता है, तो यह प्रणाली तुरंत चेतावनी जारी करती है, जिससे समय पर सुधारात्मक उपाय किए जा सकते हैं।


निर्देश और अनुपालन

पर्यावरण को प्रदूषित करने की क्षमता वाले उद्योगों से प्रदूषकों के निष्कासन को नियंत्रित करने के लिए, CPCB ने 2 फरवरी 2014 को जल और वायु अधिनियम (Water and Air Acts) की धारा 18(1)(b) के तहत SPCBs और PCCs को निर्देश जारी किए थे।

इस पहल का उद्देश्य 17 श्रेणियों के उद्योगों—जिनमें लुगदी और कागज, डिस्टिलरी, चीनी, चमड़ा उद्योग, बिजली संयंत्र, सीमेंट, तेल रिफाइनरी, उर्वरक और सामान्य बायोमेडिकल कचरा शामिल हैं—को ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करने में सहायता करना था।


नए मानकों पर विचार

CPCB के सदस्य डॉ. अनिल गुप्ता ने इसे एक स्वागत योग्य कदम बताया है। उन्होंने कहा, “हम जानते हैं कि हर साल सर्दियों के दौरान दिल्ली-एनसीआर में भारी प्रदूषण की समस्या होती है। इस क्षेत्र में स्थित उद्योग वायु गुणवत्ता के बिगड़ने में कुछ हद तक योगदान करते हैं।”

उन्होंने जोर देकर कहा कि सख्त प्रवर्तन (enforcement) से न केवल वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी, बल्कि यह उद्योगों के लिए भी फायदेमंद होगा। “जब उद्योग OCEMS स्थापित करते हैं, तो CPCB और SPCB ऑनलाइन उत्सर्जन मानक की जांच कर सकते हैं। यदि कोई उद्योग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।”

पर्यावरणविद् बीएस वोहरा ने कहा कि OCEMS और APCDs को अनिवार्य करना वास्तविक समय की निगरानी, पारदर्शिता और औद्योगिक जवाबदेही की दिशा में एक मजबूत कदम है। हालांकि, उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि उद्योग कुल क्षेत्रीय प्रदूषण का केवल पांचवां हिस्सा ही पैदा करते हैं, इसलिए जब तक इसे कड़े प्रवर्तन और अन्य पूरक उपायों का समर्थन नहीं मिलता, तब तक इसका प्रभाव सीमित रहेगा।

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