मोतिहारी: चीनी मिल चालू करने का वादा 12 साल बाद भी अधूरा, किसान मायूस

पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में बंद पड़ी चकिया और हनुमान शुगर मिलें अब पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 12 साल पूरे होने पर जहां उपलब्धियों के दावे किए जा रहे हैं, वहीं पूर्वी चंपारण के मोतिहारी में बंद पड़ी चीनी मिलों को पुनर्जीवित करने का वादा आज भी अधूरा है। वर्ष 2014 में किया गया यह वादा पूरा न होने से स्थानीय किसानों में मायूसी है।

12 साल बाद भी बंद पड़ी हैं मोतिहारी की चीनी मिलें

केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के 12 साल पूरे होने पर भाजपा “12 साल बेमिसाल” का जश्न मना रही है। देशभर में उपलब्धियों के पोस्टर, वीडियो और विकास के दावे किए जा रहे हैं। लेकिन पूर्वी चंपारण के किसानों के लिए यह सवाल आज भी खड़ा है कि आखिर उनकी चीनी मिलों का क्या हुआ?

वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी मोतिहारी के गांधी मैदान पहुंचे थे, तब मंच से उन्होंने एक वादा किया था। उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार बनने पर बंद पड़ी चीनी मिलों को चालू कराया जाएगा और अगली बार जब वह मोतिहारी आएंगे तो यहीं की चीनी से बनी चाय पिएंगे। सरकार लगातार तीन बार बनी और प्रधानमंत्री भी कई बार मोतिहारी आए, लेकिन न चीनी मिल चालू हुई और न ही मोतिहारी की चीनी वाली चाय का सपना पूरा हो सका।

खंडहर में तब्दील हुईं चकिया और हनुमान शुगर मिल

आज हालत यह है कि चकिया और हनुमान शुगर मिल का नाम सुनकर किसानों के चेहरे पर मायूसी दिखती है। जिन मिलों को कभी चंपारण की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता था, वे अब खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं। सूत्रों के अनुसार, मिलों की बड़ी हिस्सेदारी वाली जमीनें बिक चुकी हैं, मशीनें कबाड़ बन चुकी हैं और परिसर के आसपास आबादी बस चुकी है।

हर चुनाव में नेताओं को यह चीनी मिल याद आती है और मंच से किसानों के नाम पर भाषण दिए जाते हैं, रोजगार के सपने दिखाए जाते हैं तथा उद्योग पुनर्जीवित करने के वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही चीनी मिल का मुद्दा पूरी तरह से गायब हो जाता है।

स्थानीय नेतृत्व और पूर्व कृषि मंत्री पर उठे सवाल

Bharat Manthan Live News के अनुसार, इस स्थिति को लेकर अब स्थानीय नेतृत्व पर भी सवाल उठ रहे हैं। जब केंद्र में मोदी सरकार बनी तो मोतिहारी के सांसद को देश का कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री बनाया गया था।

उस समय जिले के लोगों और किसानों को उम्मीद थी कि अपना सांसद केंद्र में ताकतवर मंत्री बना है, इसलिए बंद मिलों के गेट खुलेंगे, गन्ने की खेती को नया जीवन मिलेगा और स्थानीय युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे। हालांकि, यह उम्मीदें आज तक धरातल पर नहीं उतर सकी हैं।

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