चेन्नई की रहने वाली 16 वर्षीय निशा शशिकुमार ने माउंट एवरेस्ट को साउथ साइड (दक्षिणी छोर) से फतह कर सबसे कम उम्र की पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल किया है। चित्तूर जिले से ताल्लुक रखने वाली निशा ने बृहस्पतिवार, 4 जून 2026 को अपनी इस ऐतिहासिक सफलता का श्रेय अपने पिता शशिकुमार गंधम को दिया।
चेन्नई की 16 वर्षीय निशा ने साउथ साइड से माउंट एवरेस्ट पर फतह पाकर रचा इतिहास
चेन्नई: मूल रूप से चित्तूर जिले की रहने वाली और वर्तमान में चेन्नई निवासी 16 वर्षीय निशा शशिकुमार ने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट को दक्षिणी छोर (साउथ साइड) से फतह कर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। वह इस मार्ग से एवरेस्ट शिखर पर पहुंचने वाली सबसे कम उम्र की पर्वतारोही बन गई हैं। निशा ने अपनी इस असाधारण खेल उपलब्धि का पूरा श्रेय अपने पिता शशिकुमार गंधम को दिया है।
पिता के साथ ट्रैकिंग से शुरू हुआ पर्वतारोहण का सफर
अपनी इस रोमांचक यात्रा के बारे में बात करते हुए निशा ने बताया कि पर्वतारोहण में उनकी रुचि दो साल पहले शुरू हुई थी, जब वह अपने पिता के साथ नेपाल और उत्तराखंड में ट्रैकिंग पर गई थीं। उसी दौरान उन्होंने पर्वतारोहण को गंभीरता से आगे बढ़ाने का फैसला किया। निशा के अनुसार, शुरुआत में यह काफी डरावना था, लेकिन बाद में उन्हें इसमें आनंद आने लगा। इसी अनुभव ने उन्हें ‘सेवन समिट्स चैलेंज’ (सात महाद्वीपों की सात सबसे ऊंची चोटियों को फतह करने की चुनौती) में भाग लेने के लिए प्रेरित किया।
‘सेवन समिट्स चैलेंज’ के बेहद करीब पहुंचीं निशा
साल 2024 में पिता-पुत्री की इस जोड़ी ने अफ्रीका में एक चोटी पर चढ़ने का प्रयास किया था, लेकिन बर्फानी तूफान के कारण उन्हें पीछे हटना पड़ा। इसके बावजूद निशा ने हार नहीं मानी और उसी वर्ष अप्रैल में रूस के माउंट एल्ब्रस तथा जून में अफ्रीका के माउंट किलिमंजारो पर सफलतापूर्वक चढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के माउंट कोसिआस्को, इंडोनेशिया के कार्सटेंस पिरामिड और अर्जेंटीना के माउंट एकांकागुआ को भी फतह किया। 15 साल की उम्र में इंडोनेशिया के कार्सटेंस पिरामिड पर चढ़ने के बाद निशा का नाम ‘इंडिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में भी दर्ज हो चुका है।
कैंप 3 पर छूटा पिता का साथ, लेकिन हौसला रहा बरकरार
निशा ने स्वीकार किया कि दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों को फतह करना शारीरिक और मानसिक रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था। एवरेस्ट की चढ़ाई के दौरान लगभग 7,000 मीटर की ऊंचाई पर स्थित कैंप 3 पर उनके पिता को सांस लेने में भारी तकलीफ होने लगी, जिसके कारण उन्हें वहीं रुकना पड़ा। हालांकि, उनके पिता ने निशा का हौसला बढ़ाया और उन्हें अकेले आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।
निशा ने भावुक होते हुए साझा किया, “शिखर पर पहुंचने के बाद मुझे सबसे पहले अपने पिता और दादाजी की याद आई।” उन्होंने कहा कि एवरेस्ट की चोटी पर भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराना उनके लिए एक अवास्तविक और गर्व से भर देने वाला क्षण था।
‘डेथ जोन’ की चुनौतियों को शेरपा गाइडों की मदद से किया पार
एवरेस्ट अभियान के सबसे कठिन पड़ाव का जिक्र करते हुए निशा ने बताया कि कैंप 3 से कैंप 4 और फिर अंतिम शिखर तक का रास्ता सबसे चुनौतीपूर्ण था। इस दौरान उन्हें अत्यधिक ठंड, तेज बर्फीली हवाओं, ऑक्सीजन के गिरते स्तर और सांस लेने में होने वाली दिक्कतों का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि कैंप 4, जिसे अक्सर ‘डेथ जोन’ (मृत्युकुंज) कहा जाता है, को पार करना सबसे मुश्किल था, लेकिन शेरपा गाइडों ने इस दुर्गम रास्ते को पार करने में उनकी बहुत मदद की।
बहुमुखी प्रतिभा की धनी हैं निशा शशिकुमार
पांच महाद्वीपों की चोटियों को सफलतापूर्वक फतह करने के बाद निशा का लक्ष्य अब इस साल नवंबर तक ‘सेवन समिट्स चैलेंज’ को पूरा करना है। यदि वह इसमें सफल हो जाती हैं, तो वह इस प्रतिष्ठित चुनौती को पूरा करने वाली दुनिया की सबसे युवा खिलाड़ी बन जाएंगी। उनका अगला लक्ष्य उत्तरी अमेरिका का माउंट डेनाली है।
पर्वतारोहण के अलावा निशा एक प्रशिक्षित बास्केटबॉल खिलाड़ी हैं और कराटे भी जानती हैं। इसके साथ ही उन्होंने ‘पॉलिसी रिफॉर्म्स टू क्लाइंब माउंट एवरेस्ट’ नामक एक पुस्तक भी लिखी है। वह भविष्य में स्पोर्ट्स साइकोलॉजी (खेल मनोविज्ञान) के साथ बिजनेस की पढ़ाई करना चाहती हैं। इस ऐतिहासिक गौरव की विस्तृत रिपोर्ट भारत मंथन लाइव न्यूज पर पढ़ी जा सकती है।
