भारत में स्क्रीन टाइम बढ़ने, पढ़ाई के दबाव और आउटडोर गतिविधियों में कमी के कारण बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) की समस्या तेजी से बढ़ रही है। साल 2050 तक शहरी भारत में इसके 48 प्रतिशत तक पहुंचने के अनुमान के बीच, नेत्र रोग विशेषज्ञों ने बच्चों की आंखों को सुरक्षित रखने के लिए जीवनशैली में बदलाव और शुरुआती जांच की सलाह दी है।
भारतीय बच्चों में मायोपिया के मामलों में चिंताजनक बढ़ोतरी
नई दिल्ली: देश के प्रसिद्ध नेत्र रोग विशेषज्ञों ने भारत में बच्चों के बीच मायोपिया (निकट दृष्टिदोष) के तेजी से बढ़ते मामलों को लेकर एक गंभीर चेतावनी जारी की है। चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों की जीवनशैली में आए बड़े बदलावों, लंबे समय तक स्क्रीन (मोबाइल/लैपटॉप) देखने, पढ़ाई के बढ़ते दबाव और मैदानी खेलकूद (आउटडोर एक्टिविटी) में कमी के कारण यह स्थिति बेहद गंभीर होती जा रही है।
इस सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या से निपटने के लिए ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसाइटी (AIOS) ने देश के 60 जिलों में एक व्यापक अखिल भारतीय सर्वेक्षण शुरू किया है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य बच्चों में मायोपिया के क्षेत्र-विशिष्ट प्रसार और इसकी वास्तविक स्थिति का सटीक पता लगाना है।
AIOS ने शुरू किया देश का पहला राष्ट्रीय बाल दृष्टि सर्वेक्षण
आरपीसी सिंह एम्स (AIIMS) नई दिल्ली के वरिष्ठ बाल नेत्र रोग विशेषज्ञ और ‘मायोपिया गाइडलाइन 2.0’ के कार्यक्रम निदेशक डॉ. रोहित सक्सेना के अनुसार, बच्चों में मायोपिया की व्यापकता जानने के लिए यह देश का पहला अखिल भारतीय सर्वेक्षण है। इस सर्वे के आंकड़े पूरे होने के बाद तथ्यों की जांच की जाएगी और इसके आधार पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय को आवश्यक सुझाव सौंपे जाएंगे।
वर्तमान आंकड़ों के अनुसार, भारत में 5 से 15 वर्ष की आयु के 7.5 प्रतिशत बच्चों में मायोपिया की समस्या देखी जा रही है और यह ग्राफ लगातार ऊपर की ओर बढ़ रहा है। अनुमान बताते हैं कि यदि यही स्थिति रही, तो साल 2050 तक शहरी भारत में मायोपिया का प्रसार बढ़कर 48 प्रतिशत तक पहुंच जाएगा।
गंभीर मायोपिया से हो सकता है स्थायी अंधापन
चिकित्सा पेशेवरों ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि मायोपिया को केवल एक साधारण समस्या समझकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जिसे सामान्य चश्मे से ठीक किया जा सके। गंभीर मायोपिया के कारण आंखों की पुतली (आईबॉल) स्थायी रूप से खिंच जाती है, जिससे आंखों की शारीरिक संरचना बदल जाती है। इसके कारण जीवनभर के लिए आंखों की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
डॉ. सक्सेना ने सचेत किया कि इस स्थिति के चलते भविष्य में रेटिनल डिटैचमेंट (पर्दा फटना), ग्लूकोमा (काला मोतिया), मोतियाबिंद और मैकुलर डिजनरेशन जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं, जो स्थायी अंधेपन का कारण बन सकती हैं। इसके अलावा, समय पर इलाज न मिलने से बच्चों की पढ़ाई, सीखने की क्षमता और खेलकूद में सुरक्षित भागीदारी पर भी बेहद बुरा असर पड़ता है। भारत मंथन लाइव न्यूज इस राष्ट्रीय सर्वेक्षण से जुड़े हर अपडेट को आप तक पहुंचाता रहेगा।
