डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में कमजोरी को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने विदेशी मुद्रा बाजार में आक्रामक कदम उठाया है। नवंबर महीने में केंद्रीय बैंक ने कुल 9.7 अरब डॉलर की शुद्ध बिक्री की। RBI के मासिक बुलेटिन के अनुसार, नवंबर में उसने 14.35 अरब डॉलर की खरीद और 24.06 अरब डॉलर की बिक्री की। इससे पहले अक्टूबर में भी RBI ने 11.88 अरब डॉलर बेचे थे।
रुपये पर दबाव की वजह
नवंबर में रुपये पर लगातार दबाव रहा। 21 नवंबर को रुपया डॉलर के मुकाबले 89.49 तक फिसला, जो उस समय का ऐतिहासिक निचला स्तर था। इसका मुख्य कारण अमेरिका से जुड़े व्यापारिक अनिश्चितताएं और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी थीं। पूरे महीने में रुपये में लगभग 0.8% की गिरावट दर्ज की गई।
हालात और बिगड़ते हुए, बुधवार को रुपया 91.7425 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया, जो पिछले दो महीनों में एक दिन की सबसे बड़ी गिरावट थी। वैश्विक “रिस्क-ऑफ” माहौल और घरेलू शेयर बाजार से पूंजी की निकासी ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया।
विशेषज्ञों के अनुसार, रुपये की कमजोरी के प्रमुख कारण हैं:
- मेटल इंपोर्टर्स की बढ़ती डॉलर मांग।
- विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की निकासी।
- अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर बढ़ती यील्ड, जो वैश्विक निवेशकों को सुरक्षित विकल्प की ओर खींचती है।
आम जनता पर असर
कमजोर रुपये का सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ता है। आयात महंगा होने के कारण ईंधन, खाद्य तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे महंगाई बढ़ती है।
विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए खर्च बढ़ जाता है, क्योंकि ट्यूशन फीस और रहने का खर्च डॉलर में चुकाना पड़ता है। इसके अलावा, कच्चे तेल और अन्य जरूरी वस्तुओं की अंतरराष्ट्रीय खरीदारी में डॉलर की बढ़ती कीमतें देश की आर्थिक चुनौतियों को और गहरा सकती हैं।
