देवघर: बाबा बैद्यनाथ धाम को देश के प्रमुख धार्मिक स्थलों में विशेष स्थान प्राप्त है। यहां हर माह कोई न कोई धार्मिक पर्व और परंपरा देखने को मिलती है, जिसे मनाने के लिए आसपास के जिलों के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। इन दिनों बसंत पंचमी को लेकर बाबा धाम में श्रद्धालुओं की भीड़ लगातार बढ़ रही है।
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मिथिला क्षेत्र से आने वाले श्रद्धालु बाबा बैद्यनाथ धाम पहुंचकर भगवान भोलेनाथ को तिलक अर्पित करते हैं और महाशिवरात्रि पर होने वाले पूजा-पाठ के लिए उन्हें अपने क्षेत्र में आने का निमंत्रण देते हैं। मान्यता है कि भगवान भोलेनाथ का ससुराल मिथिला में है, क्योंकि माता पार्वती को जनकपुर (सीतामढ़ी) की पुत्री माना जाता है। इसी विश्वास और परंपरा का पालन दशकों से किया जा रहा है।
मिथिला से जलाभिषेक के लिए देवघर पहुंचते हैं श्रद्धालु
श्रद्धालु अपने कंधों पर 25 से 30 किलो तक का भार उठाकर सैकड़ों किलोमीटर की कठिन यात्रा तय करते हुए बाबा धाम पहुंचते हैं। यहां वे जलाभिषेक कर तिलकोत्सव मनाते हैं। बिहार के सीतामढ़ी से आए श्रद्धालु बृजेश यादव बताते हैं कि वे तीन से चार दिनों तक देवघर में ठहरकर भगवान भोलेनाथ का तिलक महोत्सव मनाते हैं और उन्हें अपने क्षेत्र में पधारने का आमंत्रण देते हैं। जलाभिषेक के बाद भक्त आपस में मिठाइयां बांटकर खुशियां मनाते हैं। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे हर साल निभाया जाता है। श्रद्धालु खुले आसमान के नीचे रहते हैं और वहीं भोजन बनाकर ग्रहण करते हैं।
मिथिलांचल के लोग खुद को भोलेनाथ का साला मानते हैं: बाबा अंकित
मंदिर के वरिष्ठ पंडा लंबोदर परिहस्त के अनुसार मिथिला से आने वाले सभी भक्त घी अर्पित कर जलाभिषेक करते हैं। वहीं मंदिर से जुड़े बाबा अंकित का कहना है कि मिथिलांचल के लोग स्वयं को भगवान भोलेनाथ का साला मानते हैं और इसी रिश्ते की परंपरा निभाते हुए बाबा धाम में तिलकोत्सव मनाते हैं। श्रद्धालुओं की कांवर में उनके दैनिक उपयोग की सभी आवश्यक वस्तुएं होती हैं—खाने-पीने का सामान से लेकर ठंड से बचाव के कपड़े तक। जहां भी उनका पड़ाव होता है, वहीं इसी सामान का उपयोग किया जाता है।
गौरतलब है कि 23 जनवरी को बसंत पंचमी और इसके बाद 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का महापर्व मनाया जाएगा। इन पर्वों को लेकर मिथिला से आए तिलकहरू इन दिनों मंदिर परिसर से लेकर आसपास की सड़कों तक नजर आ रहे हैं और बाबा धाम की धार्मिक परंपराओं को जीवंत बनाए हुए हैं।
