नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अदालतें अनमोल जल स्रोतों को असुरक्षित नहीं छोड़ सकतीं। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने सभी राज्यों और अधिकारियों को आर्द्रभूमि की भौतिक मैपिंग और सीमांकन करने का निर्देश दिया है, जो संविधान के तहत जीवन के अधिकार का हिस्सा है।
सुप्रीम कोर्ट का जल संरक्षण पर बड़ा निर्देश
नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि अदालतें इस बात से उदासीन नहीं रह सकतीं कि अनमोल जल स्रोत असुरक्षित स्थिति में हैं। न्यायमूर्ति अरविंद कुमार और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने स्पष्ट किया कि पीने के पानी का स्रोत होने के नाते ये जल स्रोत बेहद कीमती हैं और संविधान के तहत प्रदत्त जीवन के अधिकार के दायरे में आते हैं।
भौतिक ‘ग्राउंड-ट्रूथिंग’ और अनुपालन हलफनामा
इस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए, शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और आर्द्रभूमि प्राधिकरणों (Wetland Authorities) को निर्देश दिया है कि वे जल स्रोतों की भौतिक ‘ग्राउंड-ट्रूथिंग’ (धरातलीय सत्यता की जांच) करें। साथ ही, इसके लिए अपनाए गए तौर-तरीकों का विवरण देते हुए अनुपालन हलफनामा दायर करने को कहा है।
अधिकारियों को मिला चार महीने का समय
वरिष्ठ अधिवक्ता शेखर नाफड़े ने अदालत को बताया कि अधिकारियों द्वारा धरातलीय सत्यापन का यह कार्य समय लेने वाला है और इसके लिए छह से नौ महीने का समय दिया जाना चाहिए। हालांकि, व्यापक शारीरिक कार्य और विभागों के बीच समन्वय की आवश्यकता को समझते हुए, पीठ ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए चार महीने का समय तय किया है।
नौ साल बाद भी कार्य अधूरा
शीर्ष अदालत ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि नियमों के प्रकाशन की तारीख से नौ साल बीत जाने के बाद भी धरातलीय सत्यापन और सीमांकन का कार्य पूरा नहीं किया जा सका है। यह अदालत पक्षी प्रेमी आनंद आर्य, अधिवक्ता एम के बालकृष्ण और एनजीओ ‘वनशक्ति’ द्वारा दायर एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई कर रही थी।
