नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने 2022 के कर्नाटक सिविल सेवा (वैलिडेशन) अधिनियम को असंवैधानिक करार दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विधायिका न्यायिक निर्णयों को रद्द नहीं कर सकती। यह मामला 300 से अधिक ग्रुप ए और बी पदों की 2011 की भर्ती प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसे भ्रष्टाचार और भाई-भ भतीजावाद के कारण रद्द कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सिविल सेवा (2011 बैच के राजपत्रित परिवीक्षा अधिकारियों के चयन और नियुक्ति का सत्यापन) अधिनियम, 2022 को असंवैधानिक घोषित कर दिया है। न्यायालय ने कहा कि विधायिका न्यायिक निर्णयों को निष्प्रभावी करने के लिए सत्यापन कानून का उपयोग नहीं कर सकती है।
यह अधिनियम कर्नाटक लोक सेवा आयोग (KPSC) की 300 से अधिक ग्रुप ए और बी पदों की भर्ती प्रक्रिया को पुनर्जीवित करना चाहता था, जिसे अदालतों ने पहले ही “व्यापक भ्रष्टाचार और स्पष्ट भाई-भतीजावाद” से ग्रस्त बताकर अमान्य कर दिया था।
न्यायपालिका की सर्वोच्चता और भ्रष्टाचार पर प्रहार
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला सुनाया। पीठ ने कहा कि कर्नाटक उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय द्वारा पहले ही बरकरार रखी गई चयन प्रक्रिया की रद्दीकरण को कानून के जरिए समाप्त नहीं किया जा सकता है।
अदालत ने कहा कि यह भर्ती केवल किसी मामूली त्रुटि या अनियमितता के कारण रद्द नहीं की गई थी, बल्कि पूरी चयन प्रक्रिया में व्यापक भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद शामिल था। इसके आधार पर नियुक्त किए गए उम्मीदवारों के पक्ष में कोई समानता या राहत नहीं दी जा सकती।
2011 की भर्ती का विवाद
यह विवाद कर्नाटक सरकार द्वारा 3 नवंबर 2011 को कर्नाटक राजपत्रित परिवीक्षा अधिकारियों की भर्ती नियमों, 1997 के तहत 362 ग्रुप ‘ए’ और ‘बी’ पदों के लिए जारी अधिसूचना से शुरू हुआ था।
इस भर्ती के लिए कुल 1,38,307 उम्मीदवारों ने आवेदन किया था, जिनमें से 91,667 प्रारंभिक परीक्षा में शामिल हुए थे। प्रारंभिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद मुख्य परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवार 6,211 थे, जिनमें से 1,090 उम्मीदवारों को साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था।
जांच और कानूनी कार्रवाई
वर्ष 2013 में, चयन प्रक्रिया में अवैधता की शिकायतों के आधार पर, महाधिवक्ता की सलाह पर राज्य सरकार ने सीआईडी को सौंपी गई जांच के लंबित रहने तक अंतिम चयन सूची के प्रकाशन को रोक दिया था।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद, इस दूषित भर्ती प्रक्रिया के तहत की गई सभी नियुक्तियां भी स्वतः समाप्त हो जाएंगी।
