Paras HEC Hospital में दुर्लभ ‘जिटेलमैन सिंड्रोम’ से पीड़ित महिला का सफल उपचार

रांची के पारस एचईसी हॉस्पिटल में 46 वर्षीय महिला का दुर्लभ जिटेलमैन सिंड्रोम का 50 दिनों के गहन इलाज के बाद सफल उपचार किया गया, डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने बचाई जान।

रांची: रांची स्थित Paras HEC Hospital के चिकित्सकों ने 46 वर्षीय एक महिला का सफलतापूर्वक इलाज कर एक बड़ी चिकित्सीय उपलब्धि हासिल की है। मरीज को अत्यंत गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया था। भर्ती के समय वह अनियंत्रित मधुमेह, सेप्टिक शॉक, डायबिटिक कीटोएसिडोसिस, दोनों फेफड़ों में निमोनिया, तीव्र श्वसन संकट और क्रोनिक किडनी फेल्योर जैसी गंभीर बीमारियों से जूझ रही थीं। उनकी नाजुक स्थिति को देखते हुए तत्काल वेंटिलेटर और डायलिसिस सपोर्ट पर रखा गया।

प्रारंभिक उपचार से किडनी की कार्यक्षमता में सुधार तो हुआ, लेकिन शरीर में लगातार इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन और मांसपेशियों की कमजोरी बनी रही। विस्तृत चिकित्सकीय जांच के बाद डॉक्टरों ने दुर्लभ आनुवंशिक किडनी विकार ‘जिटेलमैन सिंड्रोम’ की पहचान की। इस बीमारी में किडनी शरीर से पोटैशियम, मैग्नीशियम और सोडियम जैसे आवश्यक इलेक्ट्रोलाइट्स को अत्यधिक मात्रा में बाहर निकाल देती है, जिससे गंभीर खनिज असंतुलन हो जाता है।

नेफ्रोलॉजी विभाग के निदेशक डॉ. अशोक कुमार वैद्य के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम ने सुनियोजित उपचार शुरू किया। इलेक्ट्रोलाइट संतुलन बहाल करने, उन्नत श्वसन प्रबंधन और सघन क्रिटिकल केयर के माध्यम से मरीज की स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ।

करीब 50 दिनों तक चले गहन और समन्वित इलाज के बाद मरीज पूरी तरह स्वस्थ होकर अस्पताल से डिस्चार्ज हुईं। आगे की देखभाल और पुनर्वास के लिए उन्हें रेलवे नियमों के तहत हटिया स्थित रेलवे अस्पताल में स्थानांतरित किया गया है।

डॉ. वैद्य ने बताया कि जिटेलमैन सिंड्रोम अत्यंत दुर्लभ और जटिल बीमारी है, जिसकी पहचान करना चुनौतीपूर्ण होता है। समय पर सटीक जांच और लगातार मॉनिटरिंग से ही ऐसे मरीजों का सफल उपचार संभव है।

अस्पताल के फैसिलिटी डायरेक्टर डॉ. नीतेश कुमार ने इस सफलता को सटीक निदान, विशेषज्ञ टीमवर्क और आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि अस्पताल गंभीर और जटिल बीमारियों के उपचार के लिए उच्च स्तरीय स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध है।

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