भारत में स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट के बीच ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट फिर चर्चा में है। 23 मार्च 2026 को सामने आई जानकारी के अनुसार, यदि भारत इस प्रोजेक्ट से पीछे नहीं हटता, तो मौजूदा तेल और गैस सप्लाई प्रभावित स्थिति अलग हो सकती थी।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज संकट और भारत पर असर
ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच तनाव के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में संकट की स्थिति पैदा हो गई है। इसका असर वैश्विक तेल आपूर्ति पर पड़ा है और कई तेल टैंकर समुद्र में रुके हुए हैं।
बीमा दरों में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल के कारण भारत सहित कई देशों की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। महंगाई का दबाव भी बढ़ता नजर आ रहा है।
आंशिक राहत, लेकिन स्थिति अस्थिर
अंतरराष्ट्रीय दबाव के बीच ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को आंशिक रूप से खोला है। इसके चलते कुछ भारतीय जहाज इस मार्ग से होकर देश तक पहुंच पाए हैं।
हालांकि, इसे अस्थायी राहत माना जा रहा है और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।
ईरान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट
करीब 25 साल पहले ईरान, पाकिस्तान और भारत के बीच गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट पर बातचीत हुई थी। यह 2775 किलोमीटर लंबा प्रोजेक्ट था, जो ईरान के साउथ पार्स गैस फील्ड से भारत तक गैस पहुंचाने के लिए प्रस्तावित था।
इस परियोजना के तहत 75 करोड़ क्यूबिक फीट गैस पाकिस्तान को और शेष भारत को मिलनी थी। पाइपलाइन का व्यास 56 इंच प्रस्तावित था और इसकी अनुमानित लागत 7 से 7.5 अरब डॉलर थी।
भारत 2009-2010 में प्रोजेक्ट से अलग हुआ
भारत ने वर्ष 2009 के आसपास इस प्रोजेक्ट से खुद को अलग कर लिया था। इसके बाद यह पाइपलाइन प्रोजेक्ट केवल पाकिस्तान तक सीमित रह गया।
ईरान अपने हिस्से में लगभग 1100 किलोमीटर पाइपलाइन का निर्माण पहले ही पूरा कर चुका है।
प्रोजेक्ट से पीछे हटने के कारण
इस प्रोजेक्ट से भारत के हटने के पीछे कई कारण बताए जाते हैं। पाकिस्तान के साथ संबंध इस दिशा में एक प्रमुख चुनौती रहे।
इसके अलावा, ईरान के कथित परमाणु कार्यक्रम को लेकर उस पर लगाए गए प्रतिबंधों के कारण अमेरिका का दबाव भी एक अहम वजह रहा।
न्यूक्लियर डील का भी रहा प्रभाव
उसी समय भारत और अमेरिका के बीच सिविल न्यूक्लियर डील पर बातचीत चल रही थी।
कुछ जानकारों के अनुसार, इस डील के चलते भारत की तत्कालीन सरकार ने गैस पाइपलाइन प्रोजेक्ट से दूरी बनाने का फैसला किया।
