पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर छत्तीसगढ़ की बस्तर शांति समिति ने कड़ा ऐतराज जताया है। समिति के सदस्यों ने कहा कि जब बस्तर हिंसा से बाहर निकलकर शांति और विकास की दिशा में बढ़ रहा है, तब ऐसे बयान लोगों को भ्रमित करने का काम करते हैं।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खिलाफ जारी अभियान के बीच ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम द्वारा खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने और इस पर गर्व जताने के बयान के बाद बस्तर शांति समिति से जुड़े लोगों ने इस पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
बयान पर बस्तर शांति समिति का ऐतराज बस्तर शांति समिति के सदस्यों का कहना है कि जब बस्तर क्षेत्र दशकों की हिंसा से बाहर निकलकर शांति और विकास की ओर आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है, तब ऐसे बयान स्थानीय लोगों को भ्रमित करने का काम कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि इस तरह के बयानों से बस्तर की उस वास्तविकता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, जिसे यहां के लोगों ने लंबे समय तक झेला है।
हिंसा से प्रभावित हुए हजारों ग्रामीण परिवार समिति ने ध्यान दिलाया कि नक्सली हिंसा का असर केवल पुलिस और सुरक्षा बलों तक ही सीमित नहीं रहा है। गोलियों की आवाज, आईईडी विस्फोट, अपहरण और धमकियों के कारण ग्रामीणों, आदिवासी परिवारों, महिलाओं और बच्चों का जीवन बुरी तरह प्रभावित हुआ है। कई लोगों ने अपनों को खोया तो कई हमेशा के लिए दिव्यांग हो गए।
जमीन पर नक्सली हिंसा का दंश कांकेर के गौतरीराम विश्वकर्मा को 22 सितंबर 2009 को अगवा कर जंगल में गोली मार दी गई थी, जिससे वे बच तो गए लेकिन सामान्य जीवन में नहीं लौट सके। इसी तरह सियाराम रामटेके भी हमले में घायल होकर सहारे के जीवन के लिए मजबूर हुए। दंतेवाड़ा के नंदलाल मुड़ामी पर घर में घुसकर हमला किया गया, जबकि अवलम मारा प्रेशर बम की चपेट में आने से बुरी तरह घायल हो गए थे।
