सप्ताह के अंतिम कारोबारी दिन भारतीय शेयर बाजार में बड़ी गिरावट दर्ज की गई। शुक्रवार को 30 शेयरों वाला सेंसेक्स 1,000 अंक गिरकर 76,664 पर और निफ्टी 275 अंक फिसलकर 23,897.95 पर बंद हुआ। पश्चिमी एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और आईटी शेयरों में भारी बिकवाली के कारण घरेलू बाजार लगातार दूसरे सप्ताह दबाव में रहे।
भारतीय बाजारों में मची हलचल: आईटी सेक्टर और भू-राजनीतिक तनाव का असर
इस सप्ताह भारतीय घरेलू शेयर बाजार में लगातार दूसरे हफ्ते कमजोरी का रुख रहा। बेंचमार्क सूचकांकों में लगभग 2 प्रतिशत की गिरावट देखी गई। इसका मुख्य कारण पश्चिमी एशिया में बढ़ता तनाव, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और आईटी सेक्टर में हुई भारी बिकवाली रही।
बाजार का साप्ताहिक प्रदर्शन
सप्ताहिक आधार पर सेंसेक्स में 2.3 प्रतिशत और निफ्टी में 1.9 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई। हालांकि, मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों ने अपेक्षाकृत लचीलापन दिखाया और इनमें क्रमशः 0.6 प्रतिशत और 0.2 प्रतिशत की मामूली गिरावट रही। लिक्विडिटी के मोर्चे पर, विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने 1,369 करोड़ रुपये की बिकवाली की, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों (DIIs) ने 9,782 करोड़ रुपये की खरीदारी कर बाजार को सहारा दिया।
आईटी सेक्टर सबसे बड़ा फिसड्डी
सेक्टरों की बात करें तो आईटी सेक्टर सबसे अधिक प्रभावित रहा, जिसमें बीएसई पर लगभग 10 प्रतिशत की गिरावट आई। कमजोर मैनेजमेंट गाइडेंस के कारण निवेशकों की चिंताएं बढ़ गईं, जिससे नतीजों के बावजूद आईटी शेयरों में भारी बिकवाली देखी गई। इसके विपरीत, एफएमसीजी जैसे कंजम्पशन-ओरिएंटेड सेक्टरों ने सकारात्मक प्रदर्शन किया।
कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और वैश्विक तनाव
बाजार में अस्थिरता का एक बड़ा कारण पश्चिमी एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव है। होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतें एक सप्ताह में 15 प्रतिशत से अधिक बढ़कर 107 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। अमेरिका-ईरान के बीच अनिश्चितता और वैश्विक घटनाक्रमों ने निवेशकों को सतर्क रहने पर मजबूर कर दिया है।
आगामी सप्ताह के लिए संकेत
निवेशक अब अगले सप्ताह आने वाले प्रमुख आर्थिक आंकड़ों पर नजर रखेंगे, जिसमें शामिल हैं:
- भारत का मार्च 2026 का IIP डेटा।
- अमेरिका, चीन और जापान के अप्रैल के मैन्युफैक्चरिंग PMI आंकड़े।
- अमेरिका का PCE मुद्रास्फीति डेटा।
- फेडरल रिजर्व, बैंक ऑफ इंग्लैंड और यूरोपीय सेंट्रल बैंक की नीतिगत घोषणाएं।
