सरगुजा PEKB कोयला खदान में घुसा हाथी: दो घंटे की मशक्कत के बाद निकाला

सरगुजा की PEKB कोयला खदान में घुसा दंतैल हाथी और वन विभाग का रेस्क्यू ऑपरेशन

सरगुजा जिले के उदयपुर वन परिक्षेत्र में 29 अगस्त की देर रात अडानी द्वारा संचालित PEKB (परसा ईस्ट केते बासन) कोयला खदान में एक दंतैल हाथी घुस गया। दो घंटे की कड़ी मशक्कत के बाद वन विभाग की टीम ने सुबह 4 बजे हाथी को सुरक्षित बाहर खदेड़ा।

PEKB कोयला खदान में दंतैल हाथी का प्रवेश

भारत मंथन लाइव न्यूज की रिपोर्ट के अनुसार, सरगुजा जिले के उदयपुर वन परिक्षेत्र में पिछले कुछ दिनों से विचरण कर रहा एक इकलौता दंतैल हाथी शुक्रवार देर रात अडानी द्वारा संचालित PEKB कोयला खदान के खनन क्षेत्र में घुस आया।

हाथी के खदान परिसर में पहुंचते ही वहां कार्यरत कर्मचारियों में हड़कंप मच गया। कंटीले तारों की फेंसिंग के भीतर करीब दो घंटे तक हाथी के विचरण करने से क्षेत्र में दहशत का माहौल बना रहा।

वन विभाग की ट्रैकिंग और रेस्क्यू ऑपरेशन

वन विभाग की टीम शुक्रवार शाम 5 बजे से ही परोगिया, सैदु, सुसकम, घाटबर्रा और फतेपुर क्षेत्र के ग्रामीणों को सतर्क कर रही थी। रात करीब 12 बजे घाटबर्रा जंगल से हाथी की चिंघाड़ सुनाई देने के बाद वनकर्मियों ने ट्रैकिंग शुरू की।

रात डेढ़ से दो बजे के बीच वन अमला हाथी के नजदीक पहुंचा। गजराज वाहन नहीं पहुंच पाने के कारण वनकर्मियों को 2 से 3 किलोमीटर पैदल चलना पड़ा। खनन क्षेत्र में पहुंचने के बाद करीब दो घंटे की मशक्कत के बाद सुबह करीब 4 बजे हाथी को बाहर निकाला गया।

सुरक्षा जांच के कारण प्रवेश में हुई देरी

रेस्क्यू के दौरान वन अमले को खदान के मुख्य द्वार पर कुछ समय इंतजार करना पड़ा, क्योंकि बिना पास या कंपनी कार्ड के खदान में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। बाद में कंपनी के कैंपर वाहन से टीम को कुछ दूरी तक ले जाया गया, जिसके बाद टीम पैदल आगे बढ़ी।

एलिफेंट कॉरिडोर और हाथियों का पारंपरिक मार्ग

PEKB (परसा ईस्ट केते बासन) कोयला खदान का यह क्षेत्र पूर्व में हाथियों की आवाजाही का मुख्य मार्ग था और लेमरू एलिफेंट कॉरिडोर के अंतर्गत आता था। हालांकि बाद में कागजी प्रक्रियाओं के तहत इस क्षेत्र को कॉरिडोर के नक्शे से बाहर कर दिया गया था।

विशेषज्ञों के अनुसार, हाथियों को दशकों पुराने अपने पारंपरिक रास्ते याद रहते हैं। खदान शुरू होने के बावजूद दंतैल हाथी की इस मौजूदगी ने क्षेत्र में उनके प्राकृतिक आवास और पारंपरिक आवागमन मार्ग की याद ताजा कर दी है।

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