बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के जेनेटिक डिसऑर्डर केंद्र और बेंगलुरु के टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (TIGS) के वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक CRISPR/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक के जरिए स्टेम सेल की खोज की है। यह खोज पार्किंसंस और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में मददगार साबित हो सकती है।
पार्किंसंस और एएलएस जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज की जगी उम्मीद
वाराणसी: चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और बेंगलुरु स्थित टाटा इंस्टीट्यूट फॉर जेनेटिक्स एंड सोसाइटी (TIGS) के वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। स्टेम सेल तकनीक के क्षेत्र में हुए इस नए शोध ने पार्किंसंस डिजीज और एमियोट्रोफिक लेटरल स्क्लेरोसिस (ALS) जैसी गंभीर न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों से पीड़ित मरीजों के लिए एक नई उम्मीद जगाई है। वैज्ञानिकों ने अत्याधुनिक CRISPR/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके ऐसे स्टेम सेल विकसित किए हैं, जो इन गंभीर बीमारियों के मूल कारण तक तेजी से पहुंचकर उनके उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
भारत मन्थन लाइव न्यूज के अनुसार, इस संयुक्त शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने सफलतापूर्वक दो स्वस्थ इंड्यूस्ड प्लुरिपोटेंट स्टेम सेल (iPSC) लाइनें विकसित की हैं। इसके साथ ही उन्होंने CRISPR/Cas9 जीनोम एडिटिंग तकनीक का इस्तेमाल करके जटिल न्यूरोडीजेनेरेटिव रोगों (पार्किंसंस और एएलएस) का मॉडल तैयार किया है। यह अभूतपूर्व उपलब्धि भारत में चिकित्सा विज्ञान के क्षेत्र में सबसे गंभीर तंत्रिका संबंधी विकारों (न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर) के अध्ययन, मॉडलिंग और संभावित उपचार विकसित करने की क्षमताओं को महत्वपूर्ण रूप से बढ़ाती है।
दो पीएचडी स्कॉलर्स के शोध से मिली बड़ी कामयाबी
इस महत्वपूर्ण शोध कार्य को दो पीएचडी स्कॉलर्स सुरजीत मलाकार और शैली रॉयचौधरी द्वारा अंजाम दिया गया है। देश के इन दो प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन (MoU) के बाद ही यह ऐतिहासिक उपलब्धि संभव हो सकी है, जिसने दोनों केंद्रों की बौद्धिक और तकनीकी क्षमताओं को एक मंच पर लाने का काम किया। इस संयुक्त अध्ययन का नेतृत्व बीएचयू के प्रोफेसर परिमल दास और दीपिका जोशी के साथ-साथ टीआईजीएस की वसंत थमोधरन ने किया। दोनों केंद्रों के विशेष संसाधनों को मिलाकर शोध दल ने पार्किंसंस रोग और एएलएस के जैविक रहस्यों को समझने पर अपना ध्यान केंद्रित किया।
सेलुलर रीप्रोग्रामिंग और यामानाका फैक्टर्स का हुआ इस्तेमाल
वैज्ञानिकों की यह खोज पूरी तरह से सेलुलर रीप्रोग्रामिंग तकनीक पर आधारित है। यह तकनीक परिपक्व मानव कोशिकाओं (mature human cells) की जैविक घड़ी को प्रभावी रूप से पीछे घुमा देती है, जिससे वे अपने विकास के शुरुआती चरण में लौट आती हैं। इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा करने के लिए अनुसंधान टीम ने विशिष्ट ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स के एक सटीक संयोजन का उपयोग किया, जिसे वैज्ञानिक समुदाय में ‘यामानाका फैक्टर्स’ के नाम से जाना जाता है।
वयस्क रक्त के नमूनों से प्राप्त स्वस्थ दैहिक कोशिकाओं (somatic cells) में इन कारकों को शामिल करके वैज्ञानिकों ने उनकी पुरानी विशिष्ट पहचान को पूरी तरह से मिटा दिया। इस प्रक्रिया ने परिपक्व कोशिकाओं को एक भ्रूणीय, प्लुरिपोटेंट अवस्था में परिवर्तित कर दिया। अपनी इस मूल अवस्था में, ये नव विकसित आईपीएससी (iPSC) लाइनें अमर रहने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। ये कोशिकाएं अनिश्चित काल तक विभाजित होना जारी रख सकती हैं और मानव शरीर में पाए जाने वाले किसी भी प्रकार के ऊतक (tissue) के रूप में विकसित होने की क्षमता रखती हैं।
