मांदर को GI टैग मिलने से जरजट्टा के कारीगर उत्साहित
झारखंड की पारंपरिक संस्कृति और लोक संगीत से जुड़े मांदर को GI (Geographical Indication) टैग मिलने की खबर से गुमला जिले के रायडीह प्रखंड स्थित जरजट्टा गांव के कारीगरों में खुशी का माहौल है।
जरजट्टा गांव से 24 अक्टूबर 2021 को मांदर को GI टैग दिलाने के लिए ऑनलाइन आवेदन किया गया था। पीढ़ियों से मांदर बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे कारीगरों को उम्मीद है कि GI टैग मिलने के बाद उनके उत्पाद को देशभर में नई पहचान मिलेगी।
मांदर की मांग बढ़ने की उम्मीद
कारीगर महारंग राम और गुलाब घासी को उम्मीद है कि GI टैग के बाद मांदर की पहचान और मांग बढ़ेगी। इससे स्थानीय स्तर पर मांदर निर्माण का काम बढ़ने के साथ नई पीढ़ी भी इस पारंपरिक कला से जुड़ सकती है।
कारीगरों का कहना है कि यदि सरकार और प्रशासन की ओर से बाजार, प्रशिक्षण, आर्थिक सहायता और बिक्री के लिए बेहतर मंच उपलब्ध कराया जाए तो मांदर निर्माण को बड़े स्तर पर रोजगार का साधन बनाया जा सकता है।
वर्षों से सीमित संसाधनों के बीच कारीगर मांदर बनाने की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। कई परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इस काम से जुड़ी हुई है।
उचित मूल्य नहीं मिलने की समस्या
मांदर कारीगर चुन्नू नायक और मंगरी देवी के अनुसार, जरजट्टा गांव में बड़ी संख्या में कारीगर पारंपरिक तरीके से मांदर तैयार करते हैं। उनके लिए मांदर केवल वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि कला, संस्कृति और आजीविका से जुड़ा हुआ है।
कारीगर लकड़ी, चमड़े, मिट्टी और अन्य सामग्री का इस्तेमाल कर मांदर तैयार करते हैं। इसके निर्माण में काफी समय और मेहनत लगती है, लेकिन कई बार उन्हें अपने उत्पाद का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
उपायुक्त ने जताई खुशी
गुमला के उपायुक्त दिलेश्वर महतो ने भी मांदर को GI टैग मिलने पर खुशी जताई। उन्होंने इसे झारखंड की सांस्कृतिक विरासत और स्थानीय कारीगरों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया।
उन्होंने उम्मीद जताई कि इस पहचान से मांदर निर्माण से जुड़े कारीगरों को लाभ मिलेगा और पारंपरिक कला को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
बेहतर बाजार की उम्मीद
GI टैग मिलने के बाद जरजट्टा गांव के कारीगर अब प्रशासनिक सहयोग और बेहतर बाजार व्यवस्था की उम्मीद कर रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि इससे मांदर की मांग बढ़ेगी और कारीगरों की आय में वृद्धि होगी।
मांदर झारखंड के पर्व-त्योहारों, सामाजिक आयोजनों और पारंपरिक नृत्य-संगीत का हिस्सा रहा है। कारीगर GI टैग से जुड़ी पहचान को अपनी पीढ़ियों पुरानी कला और मेहनत के सम्मान के रूप में देख रहे हैं।
