राजनीतिक विश्लेषक: इजरायली चुनाव परिणामों के बावजूद भारत के साथ मजबूत रहेंगे संबंध

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू तेल अवीव हवाई अड्डे पर।

इजरायली लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड ने कहा है कि इजरायली चुनावों के परिणाम चाहे जो भी हों, भारत और इजराइल के बीच मजबूत संबंध प्रभावित होने की संभावना नहीं है। दोनों देशों के बीच रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बढ़ता सहयोग इस साझेदारी को मजबूत आधार देता है।

इजरायली चुनावों का भारत-इजराइल संबंधों पर असर

इजरायली लेखक और राजनीतिक विश्लेषक एलेक पोलार्ड ने स्पष्ट किया है कि आगामी इजरायली चुनावों के नतीजे चाहे जो भी आएं, भारत और इजराइल के पारंपरिक संबंध मजबूत बने रहेंगे। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्यक्तिगत तालमेल के साथ-साथ रक्षा और प्रौद्योगिकी क्षेत्र में बढ़ता सहयोग इस साझेदारी का मुख्य आधार है।

विश्लेषक पोलार्ड ने कहा, “चुनाव कोई भी जीते, इजराइल और भारत अच्छे दोस्त बने रहेंगे और दोनों में घनिष्ठता बनी रहेगी। हालांकि, नेतृत्व में बदलाव से द्विपक्षीय संबंधों में एक नया आयाम आ सकता है, जहां नए प्रधानमंत्री के लिए प्रधानमंत्री मोदी के साथ तालमेल बिठाना एक महत्वपूर्ण कारक होगा।

इजरायली चुनाव के मुख्य मुद्दे और चुनौतियां

मंगलवार को होने वाले इजरायली चुनावों में कांटे की टक्कर की उम्मीद है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को 7 अक्टूबर के हमास हमलों को लेकर तीखे सवालों का सामना करना पड़ रहा है। इसके अलावा, अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय के लिए अनिवार्य सैन्य सेवा से छूट और इजराइल के अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ने की चिंताएं भी चुनावी बहस के मुख्य केंद्र हैं।

पोलार्ड ने कहा कि 7 अक्टूबर के हमलों को इजराइल में एक बड़ी सुरक्षा और खुफिया विफलता के रूप में देखा जाता है, और कई लोग इसके लिए सीधे तौर पर नेतन्याहू को जिम्मेदार मानते हैं।

राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टिकोण

विश्लेषक ने इस बात पर भी प्रकाश डाला कि 7 अक्टूबर के हमलों की जांच के लिए राष्ट्रीय जांच आयोग (national commission of inquiry) के गठन पर अनसुलझी बहस और नेतन्याहू के प्रस्तावित न्यायिक सुधार इजरायली मतदाताओं के लिए काफी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।

जबकि नेतन्याहू ने खुद को अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना करने वाले नेता के रूप में पेश किया है, वहीं विपक्ष का तर्क है कि उनके अति-दक्षिणपंथी गठबंधन सहयोगियों ने इजराइल की बढ़ती वैश्विक अलगाव की स्थिति में योगदान दिया है।

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