रांची रिम्स का 800 करोड़ का बजट, बुनियादी सुविधाएं देने में प्रबंधन फेल

रांची रिम्स अस्पताल परिसर में बुनियादी सुविधाओं की कमी और इलाज के लिए लगी मरीजों की लंबी कतारें।

रांची स्थित राज्य के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल रिम्स में व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए 800 करोड़ रुपये का सालाना बजट होने के बावजूद प्रबंधन मरीजों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है। अस्पताल की इस अव्यवस्था के कारण हर दिन सैकड़ों मरीजों को भारी मानसिक और आर्थिक परेशानी झेलनी पड़ रही है।

लंबी कतारों और गंदगी से बेहाल हो रहे हैं मरीज

रांची: झारखंड के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल, राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (RIMS) से बदहाली की गंभीर तस्वीरें सामने आ रही हैं। अस्पताल के पास व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने के लिए 800 करोड़ रुपये का भारी-भरकम सालाना बजट उपलब्ध है। इसके बाद भी अस्पताल प्रशासन ओपीडी और वॉर्डों में मरीजों के लिए मुकम्मल इंतजाम करने में नाकाम रहा है।

अस्पताल परिसर में सुबह से ही मरीजों की लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं। रजिस्ट्रेशन काउंटर से लेकर डॉक्टरों के केबिन के बाहर तक मरीजों के बैठने के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है। इसके साथ ही, अस्पताल में हाइजीन (सफाई) का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखा जा रहा है। जगह-जगह बिखरा कचरा और गंदे शौचालय रिम्स की चरमराई सफाई व्यवस्था की पोल खोल रहे हैं, जिससे इलाज कराने आ रहे लोगों में संक्रमण फैलने का खतरा बना हुआ है।

जांच रिपोर्ट के लिए कतारें और बाहर से टेस्ट कराने की मजबूरी

रिम्स के पैथोलॉजी विभाग की स्थिति भी बेहद चिंताजनक बनी हुई है। ब्लड टेस्ट और अन्य महत्वपूर्ण जांचों की रिपोर्ट हासिल करने के लिए मरीजों को कई-कई दिनों तक विभाग के चक्कर काटने पड़ रहे हैं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में मशीनें और सुविधाएं उपलब्ध होने के बाद भी डॉक्टरों द्वारा रिम्स की रिपोर्ट को सही नहीं माना जा रहा है, जिसके कारण मरीजों को बाहर के निजी सेंटरों से महंगे टेस्ट करवाने पड़ रहे हैं।

दवाएं और इम्प्लांट भी बाहर से खरीदने को मजबूर

भारत मंथन Live News को मिली जानकारी के अनुसार, रिम्स की बदहाली का असर मरीजों की जेब पर सीधे तौर पर पड़ रहा है। डॉक्टरों द्वारा पर्ची में लिखी जाने वाली आवश्यक दवाएं अस्पताल के स्टोर से गायब हैं, जिसके कारण मरीजों को बाहर की दुकानों से महंगे दामों पर दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं। इसके अलावा, गंभीर ऑपरेशनों में इस्तेमाल होने वाले इम्प्लांट भी मरीजों को खुद के पैसों से बाहर से खरीदकर लाने पड़ रहे हैं, जिससे गरीब मरीजों का आर्थिक बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

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