सारंडा नक्सली आत्मसमर्पण: दो दर्जन माओवादी जल्द पुलिस के सामने टेक सकते हैं घुटने

झारखंड पुलिस के नक्सल विरोधी अभियान के बाद सारंडा वन क्षेत्र में आत्मसमर्पण की तैयारी करते सुरक्षा बल।

झारखंड के सारंडा वन क्षेत्र में सक्रिय करीब दो दर्जन नक्सलियों के जल्द ही पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण करने की संभावना जताई जा रही है। सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के बीच इन माओवादियों द्वारा हथियारों के साथ मुख्यधारा में लौटने की इस संभावित पहल को झारखंड पुलिस के लिए एक बड़ी कामयाबी माना जा रहा है।

सारंडा वन क्षेत्र के दो दर्जन माओवादियों के आत्मसमर्पण की संभावना

झारखंड में चलाए जा रहे निरंतर नक्सल विरोधी अभियानों के बीच सुरक्षा बलों को एक बेहद महत्वपूर्ण सफलता मिलने की उम्मीद है। विश्वसनीय सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, राज्य के कुख्यात सारंडा वन क्षेत्र में सक्रिय लगभग दो दर्जन प्रतिबंधित माओवादी उग्रवादी जल्द ही कानून के समक्ष घुटने टेक सकते हैं। बताया जा रहा है कि यह नक्सली दस्ता अपने अत्याधुनिक हथियारों के साथ आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने का मन बना चुका है।

इस संभावित आत्मसमर्पण प्रक्रिया को बेहद सुरक्षित तरीके से संपन्न कराने के लिए पुलिस मुख्यालय स्तर पर तैयारियां और प्रशासनिक औपचारिकताएं काफी तेज कर दी गई हैं। अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि इन सभी नक्सलियों का सामूहिक सरेंडर राजधानी रांची स्थित राज्य पुलिस मुख्यालय में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान कराया जा सकता है। हालांकि, संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अभी तक इस विषय पर कोई आधिकारिक पुष्टि या बयान साझा नहीं किया गया है।

सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव से कमजोर पड़ रहे हैं प्रतिबंधित संगठन

सुरक्षा मामलों के जानकारों और सूत्रों का कहना है कि सुदूर जंगलों में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और स्थानीय पुलिस की संयुक्त टुकड़ियों द्वारा लगातार चलाई जा रही आक्रामक कार्रवाई के कारण नक्सलियों का नेटवर्क पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। सुरक्षा बलों के इस बढ़ते दबाव और घटते जनसमर्थन की वजह से नक्सली संगठन सांगठनिक रूप से काफी कमजोर पड़ चुके हैं। यही मुख्य कारण है कि अब जमीनी उग्रवादी हिंसा का रास्ता छोड़कर एक सामान्य और शांतिपूर्ण जीवन अपनाने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।

सारंडा के गढ़ में नक्सलियों को लगेगा अब तक का सबसे बड़ा झटका

एशिया के सबसे घने जंगलों में शुमार सारंडा वन क्षेत्र लंबे समय से माओवादी गतिविधियों और उनके शीर्ष नेतृत्व का सबसे सुरक्षित गढ़ माना जाता रहा है। भौगोलिक रूप से दुर्गम होने के कारण नक्सली इस इलाके का इस्तेमाल अपनी रणनीतियों को अंजाम देने के लिए करते आए हैं। भारत मंथन लाइव न्यूज के अनुसार, यदि यह सामूहिक आत्मसमर्पण तय रणनीति के तहत धरातल पर उतरता है, तो इसे झारखंड पुलिस और नक्सल उन्मूलन अभियान की दिशा में अब तक की सबसे ऐतिहासिक और निर्णायक उपलब्धि माना जाएगा।

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