नई दिल्ली: सुमित सक्सेना। सुप्रीम कोर्ट ने तीन नाबालिग बच्चियों से बार-बार यौन उत्पीड़न करने के मामले में मौत की सजा पाए दोषी की फांसी के अमल पर रोक लगा दी है। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
शीर्ष अदालत ने निचली अदालतों से मांगा मूल रिकॉर्ड
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए निचली अदालतों से मूल केस रिकॉर्ड तलब किया है। इसके साथ ही अदालत ने तमिलनाडु सरकार को निर्देश दिया है कि वह 16 सप्ताह के भीतर अपीलकर्ता से संबंधित सभी प्रोबेशन अधिकारियों की रिपोर्ट प्रस्तुत करे।
यह आदेश मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के जून के उस फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर आया है, जिसमें दोषी की सजा और मौत की सजा को बरकरार रखा गया था।
अदालत का विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश
उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में उल्लेख किया था कि तीन नाबालिगों (जिनकी उम्र 6, 7 और 8 वर्ष थी) के साथ एक वर्ष की अवधि में बार-बार गंभीर यौन उत्पीड़न किया गया था और दोषी किसी भी रियायत का हकदार नहीं है।
अपील के लंबित रहने तक फांसी पर रोक लगाते हुए सर्वोच्च अदालत ने पलयमकोट्टई केंद्रीय कारागार के अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे जेल में बंद रहने के दौरान अपीलकर्ता द्वारा किए गए कार्य की प्रकृति, उसके आचरण और व्यवहार के संबंध में एक रिपोर्ट जमा करें।
इसके अलावा, अदालत ने तिरुनेलवेली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्रमुख को अपीलकर्ता का मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन करने के लिए एक उपयुक्त टीम गठित करने का आदेश दिया है। इस मूल्यांकन रिपोर्ट को 16 सप्ताह के भीतर अदालत के समक्ष प्रस्तुत करना होगा।
